कोलकाता, 23 जनवरी (भाषा) पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के होने में कुछ ही महीने शेष हैं, ऐसे में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शुक्रवार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विरासत को हथियाने के लिए अपने-अपने प्रयास तेज कर दिये हैं।
फिलहाल दोनों दलों ने नेताजी की जयंती को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जारी सियासी जंग में घसीट लिया है।
मध्य कोलकाता में राज्य सरकार के आधिकारिक कार्यक्रम से लेकर शहर के दक्षिणी हिस्से में भाजपा की रैलियों और मार्च तक, नेताजी का नाम और उनकी 129वीं जयंती एक विवादित राजनीतिक मुद्दा बन गई। एसआईआर राज्य के ध्रुवीकृत चुनावी माहौल में एक नया विवाद खड़ा कर रहा है।
रेड रोड पर राज्य सरकार द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला और सवाल उठाया कि क्या जारी एसआईआर प्रक्रिया के तहत नेताजी को भी ‘सुनवाई’ के लिए बुलाया जाता।
बनर्जी ने कहा, ‘‘अगर नेताजी जीवित होते, तो क्या उन्हें भी एसआईआर की सुनवाई के लिए बुलाया जाता। यही उनका स्वभाव है।’’ बनर्जी ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान नेताजी के पोते चंद्र कुमार बोस और अन्य लोगों को जारी किए गए नोटिसों का जिक्र करते हुए यह बयान दिया।
भाजपा का नाम लिये बिना बनर्जी ने केंद्र और निर्वाचन आयोग पर आम नागरिकों में भय फैलाने का आरोप लगाया और दावा किया कि इस प्रक्रिया से उत्पन्न ‘घबराहट’ के कारण 100 से अधिक मौतें हुई हैं।
उन्होंने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और स्वतंत्रता संग्राम के बीच वैचारिक समानता का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘यह मानवता और बर्बरता तथा पांडवों और कौरवों के बीच की लड़ाई है।’’
उन्होंने नेताजी के प्रतिरोध के नारे को दोहराते हुए प्रतीकात्मक रूप से ‘दिल्ली चलो’ का आह्वान किया।
बनर्जी ने 23 जनवरी को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की अपनी पुरानी मांग को दोहराया और केंद्र पर भारत के स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान करने और इतिहास को ‘फिर से लिखने’ का आरोप लगाया।
उन्होंने योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना की आलोचना की। उन्होंने कहा कि योजना आयोग की परिकल्पना नेताजी ने की थी। उन्होंने नीति आयोग को एक ऐसी संस्था बताया, जिसके बारे में किसी को नहीं पता कि यह आयोग काम का है या केवल नाम का।
तृणमूल द्वारा नेताजी को सत्तावादी केंद्र के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में स्थापित करने के प्रयास को तब और अधिक राजनीतिक रंग मिला जब चंद्र कुमार बोस मुख्यमंत्री के साथ मंच पर आए और उनसे (बनर्जी से) ‘राष्ट्रीय नेता’ के रूप में उभरने का आग्रह किया। चंद्र कुमार बोस कभी बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे और 2016 के चुनावों में भाबनीपुर विधानसभा सीट से बनर्जी के प्रतिद्वंद्वी थे।
बोस ने चुनावों से पहले बदलते राजनीतिक समीकरणों को रेखांकित करते हुए कहा, ‘‘मैं ममता बनर्जी से अनुरोध करता हूं कि वे न केवल बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में, बल्कि देश की नेता के रूप में भी सोचें। केवल नेताजी के आदर्श ही भारत की रक्षा कर सकते हैं।’’
हालांकि, भाजपा ने नेताजी की विरासत के इर्द-गिर्द अपने प्रतीकात्मक प्रदर्शनों के साथ इस विमर्श का खंडन किया।
नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के घर से नेताजी के एल्गिन रोड स्थित आवास तक एक पदयात्रा का नेतृत्व किया और राज्य सरकार पर बोस की जयंती को ‘एक सुनियोजित तमाशा’ में तब्दील करने का आरोप लगाया।
अधिकारी ने आरोप लगाया कि जब वह चले गए तो लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों ने नेताजी की प्रतिमा पर उनके द्वारा अर्पित की गई मालाएं हटा दीं, जिस पर राज्य सरकार ने तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
अधिकारी ने कहा कि नेताजी के जन्मदिन के कार्यक्रमों को भी राजनीतिक असहिष्णुता से नहीं बख्शा जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि तृणमूल चुनावी लाभ के लिए स्वतंत्रता सेनानी की विरासत पर एकाधिकार करने का प्रयास कर रही है।
इस बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में नेताजी को पुष्पांजलि अर्पित की जो राष्ट्रवादी प्रतीक की विरासत पर केंद्र सरकार के अपने अधिकार को स्थापित करने के समानांतर प्रयासों को रेखांकित करता है।
जैसे-जैसे एसआईआर बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में उथल-पुथल मचा रहा है, नेताजी की जयंती महज एक समारोह से कहीं अधिक बन गई है, जो राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, संस्थागत अधिकार और ऐतिहासिक स्वामित्व पर प्रतिस्पर्धी विचारों के एक मंच में तब्दील हो गई है।
भाषा संतोष सुरेश
सुरेश