नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) राज्यसभा में बुधवार को वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के कारण देश की बैंकिंग प्रणाली में काफी सुधार हुआ है तथा वाणिज्यिक बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की वसूली में भी मदद मिली है।
उन्होंने सदन में ‘दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025’ पर चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि विधेयक के माध्यम से आईबीसी में 12 संशोधन प्रस्तावित हैं।
उनके जवाब के बाद उच्च सदन ने ध्वनिमत से इस विधेयक को मंजूरी दे दी। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विधेयक का यह उद्देश्य नहीं है कि किसी कंपनी का परिसमापन किया जाए बल्कि समाधान प्रदान कर उसकी समस्याओं को दूर किया जाए। उन्होंने विश्वास जताया कि इससे ऋणदाताओं के कर्ज को वसूली करने में मदद मिलेगी और यह प्रक्रिया कम समय में पूरी होगी।
सीतारमण ने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता से भारतीय बैकिंग प्रणाली की स्थिति में काफी सुधार हुआ है।
उन्होंने कहा कि एनपीए की वसूली में इस संहिता की प्रभावी भूमिका रही है। सीतारमण के अनुसार वाणिज्यिक बैंक के एनपीए की कुल वसूली में दिवाला संहिता का 54 प्रतिशत से अधिक का योगदान रहा है।
सीतारमण का कहना था कि आईबीसी का कभी यह बुनियादी मकसद नहीं रहा कि इसे कर्ज वसूली के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि आईबीसी की व्यवस्था के कारण अब दिवाला से जुड़े मामलों के निस्तारण में कंपनियां पहले से बहुत बेहतर काम कर रही हैं, जबकि पहले ऐसा नहीं था।
सरकार ने 12 अगस्त, 2025 को आईबीसी में संशोधन करने वाला विधेयक लोकसभा में पेश किया था, जिसमें दिवाला समाधान आवेदनों को स्वीकार करने में लगने वाले समय को कम करने के प्रावधानों सहित कई संशोधन प्रस्तावित थे।
विधेयक को लोकसभा की एक प्रवर समिति को भेजा गया, जिसने दिसंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंपी।
आईबीसी में अब तक सात बार संशोधन किए गए हैं। प्रवर समिति ने विधेयक में कुल 11 बड़ी अनुशंसाएं कीं, जिन्हें सरकार ने स्वीकार कर लिया।
वित्त मंत्री के मुताबिक, सरकार ने एक और सिफारिश को इसमें जोड़ा है कि कर्जदाताओं की समिति को आवेदकों को चयन करने के कारणों को दर्ज करना होगा ताकि पारदर्शिता आ सके।
भाषा
मनीषा माधव अविनाश
अविनाश