संसदीय समिति ने महिला एवं बाल कल्याण योजनाओं में निधि की कमी, रिक्तियों पर चिंता जताई

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संसदीय समिति ने महिला एवं बाल कल्याण योजनाओं में निधि की कमी, रिक्तियों पर चिंता जताई

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  • Publish Date - March 25, 2026 / 09:33 PM IST,
    Updated On - March 25, 2026 / 09:33 PM IST

नयी दिल्ली, 25 मार्च (भाषा) संसद की एक समिति ने महिला एवं बाल कल्याण की प्रमुख योजनाओं को अपर्याप्त वित्तपोषण, कर्मियों की कमी और कार्यान्वयन में खामियों को उजागर करते हुए अधिक आवंटन और तत्काल सुधारों की मांग की है।

राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल संबंधी संसद की स्थायी समिति ने 2026-27 के लिए अनुदान मांगों पर अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की।

रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) के लिए आवंटित 36 करोड़ रुपये का बजट ‘‘पूरी तरह से अपर्याप्त’’ है और इसे पर्याप्त रूप से बढ़ाया जाना चाहिए ताकि यह अपने दायित्वों को प्रभावी ढंग से पूरा कर सके।

समिति ने कई प्रमुख योजनाओं के लिए आवंटन में कटौती पर भी चिंता व्यक्त की और कहा कि केंद्र का यह तर्क कि राज्य समय पर धन नहीं ले रहे हैं, विश्वसनीय नहीं है।

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि मंत्रालय को राज्यों द्वारा निधियों की निकासी की धीमी गति के कारणों की पहचान करनी चाहिए और सुधारात्मक उपाय करने चाहिए, ताकि राज्यों द्वारा निधियों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके और योजनाओं के कार्यान्वयन में कोई बाधा न आए।

‘मिशन सक्षम आंगनवाड़ी’ और ‘पोषण 2.0’ पर समिति ने बढ़े हुए आवंटन का स्वागत किया, लेकिन भोजन की गुणवत्ता, कम लागत के मानदंडों और मानव संसाधन की कमी पर चिंता व्यक्त की।

समिति ने एकसमान और पौष्टिक भोजन सुनिश्चित करने के लिए लागत मानदंडों में संशोधन की सिफारिश की और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के मानदेय में जल्द से जल्द वृद्धि करने का आग्रह किया। साथ ही, वर्तमान मानदेय को ‘‘बहुत कम’’ बताया गया।

समिति ने पाया कि बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) के 33.18 प्रतिशत से अधिक पद रिक्त हैं और स्वीकृत पदों की संख्या में 2008-09 से कोई संशोधन नहीं किया गया है।

समिति ने सरकार से कर्मचारियों की आवश्यकताओं की समीक्षा करने और रिक्त पदों को शीघ्रता से भरने का आग्रह किया।

‘मिशन शक्ति’ पर समिति ने कहा कि ‘वन-स्टॉप सेंटर’ असल में ‘‘अल्पकालिक आवास’’ बन गए हैं। समिति ने सिफारिश की कि इनके अंदर ही पुलिस सहायता और कानूनी सहायता मिलनी चाहिए, न कि पीड़िता को अलग से पुलिस थानों में जाना पड़े।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को इस योजना के प्रभाव और परिणामों का आकलन किसी तृतीय पक्ष से करवाना चाहिए।’’

महिला हेल्पलाइन (181) पर चिंता जताते हुए समिति ने कहा कि यह ‘‘महज एक कॉल सेंटर’’ बन गया है और इसे जमीनी बचाव दल और सहायता सेवाओं से जोड़ने की सिफारिश की।

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई) पर, रिपोर्ट में सभी पात्र लाभार्थियों को समय पर प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) करने की मांग की गई है।

समिति ने निर्भया कोष के तहत आवंटित राशि और वास्तविक रूप से जारी रकम के बीच मौजूद अंतर पर चिंता व्यक्त की। समिति ने पाया कि शुरुआत से आवंटित किये गए 8,212.85 करोड़ रुपये में से केवल 6,581.84 करोड़ रुपये ही जारी किये गए हैं।

समिति ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) में कर्मचारियों की गंभीर कमी पर भी चिंता व्यक्त की तथा उल्लेख किया कि स्वीकृत 36 पदों में से केवल दो पर ही स्थायी कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि शेष पद या तो रिक्त हैं या संविदा के आधार पर भरे गए हैं।

भाषा सुभाष अविनाश

अविनाश