पैलेट गन से जख्मी व्यक्ति इलाज के बावजूद हमेशा के लिए हो सकता अशक्त: विशेषज्ञ
पैलेट गन से जख्मी व्यक्ति इलाज के बावजूद हमेशा के लिए हो सकता अशक्त: विशेषज्ञ
नयी दिल्ली, 30 जुलाई (भाषा) नीट प्रश्नपत्र लीक मामले के विरोध में प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शिनकारियों पर पुलिस की कथित ज्यादतियों और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर संसद में जारी बहस के बीच विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पैलेट गन से लगी चोटें व्यक्ति को स्थायी रूप से अशक्त बना सकती है, खासतौर पर तब जब कोमल ऊतकों को काफी नुकसान हुआ हो, हड्डियों में विकृति आई हो, या नसों और रक्त वाहिकाओं का संपर्क टूट गया हो।
विशेषज्ञों के मुताबिक मुख्य नसों, रक्त वाहिकाओं, हड्डियों और जोड़ों, रीढ़ की हड्डी और महत्वपूर्ण अंगों जैसे दोबारा ठीक होने की सीमित क्षमता वाले हिस्सों में चोट लगने पर, सही इलाज के बावजूद लंबे समय तक अशक्तता, लगातार दर्द या अंगों के काम करना बंद करने जैसी स्थायी समस्या हो सकती है।
कॉजपा के आह्वान पर 20जुलाई को प्रदर्शनकारी नीट प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ ‘चलो संसद’ मार्च कर रहे थे और उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने कथित तौर पर उनके खिलाफ बर्बर कार्रवाई की थी। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठी चार्ज किया।
जब पैलेट से चली गोली लगने से घायल हुए प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें और वीडियो ऑनलाइन सामने आए, तो आरोप लगाया गया कि द्रुत कार्य बल (आरएएफ) ने छात्रों पर कई मेटल पैलेट (धातु के छर्रे) चलाए, जिससे उन्हें कई जगह चोटें आईं और वे अशक्त हो गए।
पैलेट गन से ऐसी गोलियां चलाई जाती हैं जिनमें धातु या रबर के 600 तक छर्रे होते हैं और ये 1,000 फुट प्रति सेकंड की रफ्तार से चारों ओर फैल जाते हैं।
मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय से संबद्ध फारेंसिक विज्ञान विद्यालय की प्राध्यापिका शालिनी सोलंकी ने बताया कि आम बंदूक से चलाई गई गोली अंत तक विखंडित नहीं होती, जबकि शॉटगन या पैलेट गैन की गोली कई छोटे-छोटे छर्रों में बिखर जाती है।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘नतीजतन, चोट की गंभीरता न केवल शरीर पर लगने वाले छर्रों की संख्या पर निर्भर करती है, बल्कि फायरिंग की दूरी, छर्रे का आकार, टकराने की गति, टकराने का कोण और सबसे महत्वपूर्ण बात, शरीर के प्रभावित हिस्से जैसी बातों पर भी निर्भर करती है।’’
राष्ट्रीय राजधानी की घटना में साहिल लोचाब नाम के एक किशोर की दाहिनी आंख की रोशनी जा सकती है, जबकि अन्य छात्रों के चेहरे, गर्दन, छाती, हाथों और पैरों पर चोटें आई हैं।
लोचाब के परिवार ने बताया कि चिकित्सकों ने उन्हें जानकारी दी कि जिन छर्रों से चोटें आईं, वे धातु के बने थे। वहीं आरएएफ ने 28 जुलाई को एक बयान में कहा कि उसने दंगा-रोधी उपकरणों का इस्तेमाल किया और गैर-घातक गोली से कई राउंड फायरिंग की, जिसमें प्लास्टिक के छर्रों से दो राउंड की फायरिंग शामिल थी।
ग्रेटर नोएडा वेस्ट स्थित सर्वोदय अस्पताल में हड्डी और रोबोटिक जोड़ प्रत्यारोपण विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. निखिल वलसांगकर ने कहा, ‘‘दूर से चलाए गए छर्रों से कई सतही घाव होते हैं और ऊत्तकों को कम नुकसान पहुंचता है। लेकिन पास से चलाने पर, छर्रे एक साथ मिलकर एक ही चीज की तरह टकराते हैं, जिससे ऊत्तकों को बहुत ज़्यादा और जटिल नुकसान पहुंचता है, कोमल उत्तकों को क्षति होती है और बहुत ज्यादा खून बहता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘पैलेट से लगी सतही चोटें और बहुत ज़्यादा लचीली मांसपेशियों की चोटें अक्सर अच्छी तरह ठीक हो जाती हैं या उनमें खिंचाव से होने वाली ऐसी चोटें लगती हैं जो ज्यादातर ठीक हो सकती हैं। लेकिन कोमल ऊत्तकों को काफी क्षति होने, हड्डियों में खराबी आने, या नसों और रक्त वाहिकाओं का संपर्क टूट जाने, ऐसे जख्म पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाते हैं।’’
नयी दिल्ली के यथार्थ अस्पताल में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी की विशेषज्ञ डॉ. साक्षी सिंघल ने कहा, ‘‘इसके कारण होने वाली स्थायी अशक्तता में दृष्टि दोष, सुनने की क्षमता खोना, लगातार दर्द, जोड़ों में अकड़न और मानसिक आघात शामिल हो सकते हैं।’’
भाषा धीरज नरेश
नरेश

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