(अलिंद चौहान)
नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को लिखे एक पत्र में कई मुद्दे उठाए हैं। इनमें ‘प्रोजेक्ट चीता’ को लागू करने से जुड़ी जानकारी को राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश संबंधों का हवाला देकर छिपाना, आरटीआई अधिनियम का उल्लंघन और कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों को बेहोश करने की प्रक्रिया में अनियमितताएं जैसे विषय शामिल हैं।
एनटीसीए ‘प्रोजेक्ट चीता’ की देखरेख करता है।
पत्र में कहा गया, ‘‘उन स्थानीय परियोजना अधिकारियों की हालिया कार्रवाइयों ने परियोजना के कामकाज के तरीके को अस्वीकार्य और कानूनी रूप से अमान्य बना दिया है, जिन्होंने व्यवस्थित रूप से जानवरों के कल्याण, पशु चिकित्सा संबंधी डेटा और प्रशासनिक खर्चों तक जनता की पहुंच को बाधित किया है।’’
इसमें रेखांकित किया गया कि ‘प्रोजेक्ट चीता’ प्रशासन में अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक का पद संभाल रहे उत्तम कुमार शर्मा, असल में लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) और प्रथम अपीलीय अधिकारी (एफएए) दोनों की भूमिका निभाते हैं।
पीआईओ वह अधिकारी होता है, जो सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत दायर सवालों का जवाब देने के लिए ज़िम्मेदार होता है, जबकि एफएए उसी सरकारी संस्था में पीआईओ से उच्च पद का अधिकारी होता है। यदि पीआईओ जवाब देने से मना कर दे, देरी करे या अधूरा जवाब दे, तो एफएए ही प्रथम अपील की सुनवाई करता है।
दुबे ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि 2024 में जब उन्होंने ‘प्रोजेक्ट चीता’ के बारे में आरटीआई के तहत जानकारी मांगी, तो उन्हें शर्मा से जवाब मिला, जिनका पद पीआईओ बताया गया था।
हालांकि, पिछले महीने उन्हें अपने आरटीआई प्रश्न के संबंध में एक और पत्र मिला, जिसमें शर्मा का पद एफएए बताया गया।
दुबे ने एनटीसीए को लिखे अपने पत्र में कहा है, ‘‘यह आरटीआई अधिनियम, 2005 का गंभीर उल्लंघन है। कानून में साफ तौर पर दो-स्तरीय स्वतंत्र व्यवस्था का प्रावधान है, ताकि कोई भी पीड़ित नागरिक पीआईओ के फैसले के खिलाफ किसी वरिष्ठ अधिकारी के पास अपील कर सके।’’
पत्र में यह भी कहा गया है कि ‘प्रोजेक्ट चीता’ के अधिकारियों ने अधिनियम की धाराओं 8(1)(ए) और 8(1)(जे) का गलत इस्तेमाल करके, प्रोजेक्ट से जुड़े आरटीआई आग्रह को बार-बार बाधित किया है।
दुबे ने अपने पत्र में कहा कि प्रबंधन की नाकामियों, ऑडिट रिपोर्ट या प्रशासनिक खामियों को छिपाने के लिए ‘शासकीय गोपनीयता’ का सहारा लेने से देश की सुरक्षा नहीं होती, बल्कि इससे खराब काम करने वाले अधिकारी जनता की नजर से बच जाते हैं।
कार्यकर्ता के अनुसार, ‘प्रोजेक्ट चीता’ के मामले से उलट, बाघों के मामले में एनटीसीए मानक संचालन प्रक्रिया, मौत के आंकड़े, पोस्टमॉर्टम की जानकारी और आबादी के अनुमान जैसी जानकारी सार्वजनिक रूप से जारी करता है।
उन्होंने उन आरोपों से जुड़ा एक और मुद्दा उठाया है कि चीतों को मुख्य वन्यजीव वॉर्डन से आवश्यक मंज़ूरी लिये बिना ही आवश्यकता से अधिक बेहोश किया गया, जो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 का उल्लंघन है।
पूर्व में, मध्यप्रदेश के तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव वार्डन वी.एन. अंबाडे की सितंबर 2024 की निरीक्षण रिपोर्ट से पता चला कि ‘प्रोजेक्ट चीता’ शुरू होने के सिर्फ़ दो साल के अंदर ही कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों को 110 बार बेहोश किया गया।
दुबे ने अपने पत्र में कहा, ‘‘वर्ष 2024 में हुई एक जांच के दौरान, मध्यप्रदेश के मुख्य वन्यजीव वार्डन श्री अंबाडे ने कूनो में चीतों को बेहोश करने की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा किया… इन ‘मेडिकल लॉग्स’ की जानकारी न देने से साफ़ पता चलता है कि प्रशासनिक और चिकित्सीय लापरवाही को छिपाने की जान-बूझकर कोशिश की गई है।’’
उन्होंने एनटीसीए से कहा है कि वह 2024 में संबंधित राष्ट्रीय उद्यान में की गई जानवरों को बेहोश करने की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच शुरू करे।
भाषा नेत्रपाल सुरेश
सुरेश