जोधपुर, चार अप्रैल (भाषा) राजस्थान उच्च न्यायालय ने उभयलिंगी आरक्षण पर अपने हालिया फैसले के उपसंहार में संशोधन किया है, जिसमें न्यायालय ने उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 पर गंभीर टिप्पणियां करते हुए कहा था कि यह अधिनियम ट्रांसजेंडरों के अपने लिंग की पहचान स्वयं करने के अधिकार को छीन लेता है।
न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की पीठ ने उपसंहार को पूरी तरह से हटाने से इनकार कर दिया, लेकिन इस बात पर सहमति जताई कि इसमें कुछ अनुच्छेद नहीं होने चाहिए थे।
उपसंहार से संबंधित स्पष्टीकरण की मांग कर रहे 29 वर्षीय उभयलिंगी याचिकाकर्ता के वकील विवेक माथुर ने कहा, ‘‘न्यायालय ने स्पष्टीकरण देने के साथ कुछ अंशों को हटाने का आदेश दिया है जो न्यायालय के अनुसार गलती से शामिल हो गए थे, लेकिन इन्हें शामिल किये जाने की ना तो मंशा थी और ना ही आवश्यकता।’’
यह संशोधन न्यायालय के 30 मार्च के उस फैसले के तीन दिन बाद आया है, जिसमें 2023 की राज्य अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। इस अधिसूचना में ट्रांसजेंडरों को बिना किसी अलग आरक्षण ढांचे के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी में रखा गया था।
अपने मूल फैसले में न्यायालय ने एक उपसंहार जोड़ा था, जिसमें इस बात पर चिंता व्यक्त की गई थी कि 2026 का संशोधन उच्चतम न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त स्वत:-अनुभूत लैंगिक पहचान के संवैधानिक सिद्धांत से विचलन को दर्शाता है।
अब हटाए जा चुके अंशों में चेतावनी दी गई थी कि कानूनी लैंगिक मान्यता को प्रमाणीकरण या प्रशासनिक जांच पर निर्भर करने से व्यक्ति के अस्तित्व के एक अविभाज्य पहलू को राज्य की मध्यस्थता वाले अधिकार में तब्दील करने का जोखिम है।
हालांकि, अपने संशोधित आदेश में उच्च न्यायालय ने इन टिप्पणियों को हटा दिया और स्पष्ट किया कि ये मामले के निर्णय के लिए आवश्यक नहीं थीं।
उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, लोकसभा द्वारा 24 मार्च को पारित किया गया और अगले दिन इसे राज्यसभा की मंजूरी प्राप्त हुई। इसे 30 मार्च को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।
भाषा संतोष माधव
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