एनसीईआरटी की संशोधित पाठ्यपुस्क में बंटवारे पर कांग्रेस का रुख बदला, हिटलर का जिक्र हटाया गया

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एनसीईआरटी की संशोधित पाठ्यपुस्क में बंटवारे पर कांग्रेस का रुख बदला, हिटलर का जिक्र हटाया गया

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  • Publish Date - July 8, 2026 / 05:13 PM IST,
    Updated On - July 8, 2026 / 05:13 PM IST

नयी दिल्ली, आठ जुलाई (भाषा) कक्षा आठ के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की ओर से जारी सामाजिक विज्ञान की संशोधित पाठ्यपुस्तक में 1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे को लेकर कांग्रेस के रुख को बदले स्वरूप में पेश किया गया है और कहा गया है कि विभाजन को ही आगे बढ़ने का एकमात्र स्वीकार्य रास्ता मानने संबंधी रुख पर बहस अब भी जारी है।

संशोधित पाठ्यपुस्तक में जहां वीडी सावरकर की ‘स्वराज’ की मांग को शामिल किया गया है, वहीं एडॉल्फ हिटलर और नाजी विचारधारा का जिक्र हटा दिया गया है।

एनसीईआरटी ने न्यायपालिका को कथित तौर पर बदनाम करने को लेकर उपजे विवाद के कुछ महीनों बाद कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की संशोधित पाठ्यपुस्तक ‘समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे’ जारी की, जिसमें विवादित हिस्सों को हटा दिया गया है।

संशोधित पाठ्यपुस्तक में विवादित हिस्सों के साथ-साथ अदालतों में लंबित मामलों और दो अहम न्यायिक फैसलों से जुड़े संदर्भों को हटा दिया गया है, जबकि जनहित याचिका, न्यायाधिकरणों और वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र से संबंधित नयी सामग्री शामिल की गई है।

संशोधित पाठ्यपुस्तक में कई और बदलाव भी किए गए हैं।

‘भारत की आजादी का लंबा सफर’ शीर्षक वाले इतिहास के अध्याय में कहा गया है कि “कांग्रेस ने भी बंटवारे का जबरदस्त विरोध किया था” और यह बात आज भी बहस का विषय है कि क्या विभाजन को स्वीकार करना ही “आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता” था।

संशोधित संस्करण में पिछली किताब में शामिल उस वाक्य को भी हटा दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि “बंटवारे के दौरान जब पूरा उपमहाद्वीप सांप्रदायिक नरसंहार से जूझ रहा था, तब कांग्रेस नेता बेबस थे।”

पिछली किताब में यह भी कहा गया था कि “अंग्रेजों ने हिंदू और मुस्लिम नेताओं के बीच मतभेद का फायदा उठाते हुए भारत का बंटवारा करने का फैसला किया और हालांकि, महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं ने विभाजन का विरोध किया था, लेकिन आखिरकार उन्होंने इसे ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता मानकर स्वीकार कर लिया।”

संशोधित पाठ्यपुस्तक में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग से जुड़ी कहानी को और विस्तार से दिया गया है। इसमें जोड़ा गया है कि “1925 में वीडी सावरकर ने भी ‘स्वराज’ की ऐसी ही मांग की थी।”

पिछली किताब में कहा गया था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सेना बनाने के लिए हिटलर का समर्थन मांगा था और जर्मन नेता को एक ऐसा “तानाशाह” बताया था, जिसकी “नस्ली नाजी विचारधारा और विस्तारवादी सोच” ने ही दूसरे विश्व युद्ध को भड़काया था।

वहीं, संशोधित संस्करण में हिटलर और नाजी विचारधारा का जिक्र हटाते हुए कहा गया है कि बोस ने “ब्रिटिश-विरोधी ताकतों से समर्थन मांगा था।”

फरवरी में एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ खंड को लेकर विवाद खड़ा हो गया था।

उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद पाठ्यपुस्तक की मुद्रित और डिजिटल प्रतियां वापस ले ली गई थीं और एनसीईआरटी ने इस मामले में माफी भी मांगी थी।

शीर्ष अदालत ने उक्त पाठ्यपुस्तक के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण या डिजिटल प्रसार पर “पूर्ण प्रतिबंध” लगा दिया था। न्यायालय ने कहा था कि इसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित “आपत्तिजनक” सामग्री शामिल है।

संशोधित पाठ्यपुस्तक के आभार खंड में कहा गया है कि इसका प्रकाशन उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में की गई समीक्षा प्रक्रिया के बाद किया गया है।

इसमें कहा गया है कि शीर्ष अदालत के 16 मार्च के आदेश में दिए गए निर्देशों के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से गठित एक विशेषज्ञ समिति ने अध्याय चार ‘समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ को “फिर से लिखा” है।

वापस ली गई पाठ्यपुस्तक को तैयार करने वाली टीम में 51 सदस्य शामिल थे। वहीं, संशोधित संस्करण को तैयार करने वाली टीम में 48 सदस्यों के नाम शामिल हैं। जिन तीन सदस्यों के नाम हटाए गए हैं, उनमें मिशेल डेनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार शामिल हैं। इन तीनों को हटाए गए विवादित अध्याय के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।

भाषा पारुल नरेश

नरेश