(प्रचेता चौहान)
ऋषिकेश, 22 फरवरी (भाषा) कोविड महामारी के बाद ऋषिकेश में जहां मन की शांति की खोज में आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई है, तो वहीं ‘रिवर राफ्टिंग’ और ‘बंजी जंपिंग’ जैसे साहसिक खेलों में रुचि लेने वाले घरेलू सैलानियों की संख्या भी बढ़ रही है।
योग की विश्व राजधानी कहा जाने वाला ऋषिकेश अब केवल आध्यात्मिकता का केंद्र भर नहीं रह गया है। यहां गंगा की लहरों पर रिवर राफ्टिंग का रोमांच है, बंजी जंपिंग की ऊंचाइयां हैं, ‘जायंट स्विंग’ की धड़कनें हैं और इनके बीच सेल्फी लेते, हंसते-खिलखिलाते पर्यटकों की भीड़ है।
तपोवन से लक्ष्मण झूला की ओर जाती संकरी गलियों में विदेशी पर्यटकों की अच्छी-खासी मौजूदगी देखी जा सकती है। यहां स्थित कैफे ‘मोक्तान’, दक्षिण भारतीय भोजनालय ‘अन्ना मेस’ से आती डोसे की खुशबू और आसपास फैले योग एवं कल्याण केंद्र, योग और पर्यटन का अनूठा संगम दर्शाते हैं।
मोक्तान कैफे में ऑस्ट्रेलियाई मूल की कैरोलीन बैठी थीं। उन्होंने भाषा के साथ बातचीत में कहा कि पिछले वर्ष सितंबर में यहां उन्होंने 500 घंटे का योग शिक्षक प्रशिक्षण पूरा किया और जनवरी में योग में स्नातकोत्तर किया।
उनका कहना था, ‘‘ऋषिकेश इसलिए खास है क्योंकि यहां लोग सिर्फ आंतरिक विकास के लिए आते हैं। लोगों के चेहरों पर मुस्कान देखकर लगता है कि वे जो ढूंढ़ रहे थे, वो मिल भी रहा है।’’
कैरोलीन अपनी नौकरी छोड़कर यहां आध्यात्मिकता और योग सीखने पहुंची थीं।
जर्मनी की पर्यटक जोई ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह यहां योग सीखने के उद्देश्य से आई हैं। उन्होंने कहा, ‘‘मेरी बहन ने योग करने का सुझाव दिया था। मुझे लगा कि योग सीखने की भारत से बेहतर जगह कोई नहीं है।”
इन विदेशी साधकों में एक समानता स्पष्ट दिखती है-मन की शांति की खोज।
ऋषिकेश में गंगा नदी के घाटों से कुछ दूरी पर बहुत से कैफे हैं जिनमें रात दस बजे तक उत्सव जैसा माहौल बना रहता है। लाइव म्यूजिक की धुनें, हंसी-ठहाकों की गूंज और अनजान चेहरों के बीच बनती नयी पहचानें मिलकर एक नए ऋषिकेश की तस्वीर पेश करती हैं। हालांकि इस भीड़ में विदेशी पर्यटक अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं।
अध्यात्म और योग की इस नगरी में गंगा शांत लय बहती है और सामने खड़े पर्वत ध्यानमग्न प्रतीत होते हैं।
जोई ने अपने होटल की ऊपरी मंजिल पर स्थित कैफे से यह दृश्य देखते हुए कहा, ‘‘ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे प्रकृति स्वयं साधना में लीन हो।’’
कैरोलीन कहती हैं कि आध्यात्मिक खोज और आंतरिक शांति की तलाश में आने
वालों को यह नगर आकर्षित करता है।
यहां के योगाश्रमों में साधक ध्यान, प्राणायाम और गहन अभ्यास में समय बिताते हैं।
योग केंद्रों में भारतीयों की उपस्थिति तो है लेकिन विदेशियों की तुलना में वे अपेक्षाकृत कम नजर आते हैं।
इसी तपोवन में 14 साल से आध्यात्मिक स्कूल चला रहे एक योग गुरु ने बताया कि कोविड-19 के बाद सरकार ने यहां पर्यटन पर खास ध्यान दिया है जिसके कारण पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई है।
एक सवाल के जवाब में उनका कहना था कि साहसिक खेलों और योग दोनों में ही पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई है लेकिन तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो साहसिक खेलों के लिए लोग ज्यादा आते हैं।
उन्होंने बताया कि यहां योग सीखने के लिए 25 से 60 व इससे ज्यादा की उम्र के लोग भी आते हैं।
वहीं, एक अन्य योग गुरु ने बताया कि भारतीय पर्यटक योग को गंभीर साधना के
रूप में नहीं लेते। उनका यह भी कहना था कि समय के साथ योग का व्यावसायीकरण
भी बढ़ा है।
वर्ष 2017 से योग सिखा रहे प्रशिक्षक दीपक ने बताया कि भारतीयों और
विदेशियों की संख्या स्थान के अनुसार बदलती रहती है। उनके अनुसार, बाजार
या शहर के मुख्य इलाकों में आयोजित कक्षाओं में स्थानीय लोग और भारतीय
पर्यटक अच्छी संख्या में भाग लेते हैं, जबकि तपोवन जैसे क्षेत्रों में
विदेशी साधकों की भागीदारी अधिक रहती है।
उनका कहना था कि कोविड के बाद भारतीय पर्यटकों की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनमें से अधिकतर साहसिक खेलों के लिए आते हैं तथा योग उनकी प्राथमिकता नहीं होता।
ऋषिकेश निवासी और योग प्रशिक्षक सूरज ने बताया कि भारतीय पर्यटकों में केवल 20 प्रतिशत लोग योग के लिए आते हैं, जबकि 80 प्रतिशत पर्यटक साहसिक खेलों, घूमने-फिरने और पार्टियों आदि के लिए ऋषिकेश को चुनते हैं। उनका कहना था कि राफ्टिंग जैसे खेलों में भी विदेशी पर्यटक तुलनात्मक रूप से कम होते हैं।
ऋषिकेश पिछले चार-पांच साल में साहसिक खेलों के लिए तेजी से लोकप्रिय हुआ है जिनमें युवाओं के बीच व्हाइट रिवर राफ्टिंग, बंजी जंपिंग, रिवर्स बंजी जंपिंग, फ्लाइंग फॉक्स और क्लिफ डाइविंग को लेकर काफी जुनून है। इन खेलों के लिए सबसे बेहतरीन समय मार्च से लेकर जून तक रहता है।
सूरज ने बताया कि इस सीजन में साहसिक खेलों के लिए यहां घरेलू स्तर पर युवा पर्यटकों की भारी भीड़ रहती है।
शाम के समय ‘गुड टाइम्स कैफे’ में बैठकर गंगा को समर्पित दीपकों की टिमटिमाती रोशनी को निहारती हरियाणा निवासी और यहां ध्यान मार्गदर्शक के रूप में कार्य करने वाली 27 वर्षीय रक्षिता ने बताया कि योग कक्षाओं में प्रतिभागियों की संख्या अच्छी रहती है, लेकिन उनमें लगभग 95 प्रतिशत विदेशी होते हैं। इसका कारण पूछने पर उन्होंने कहा, ‘‘जो चीज हमें सहज
रूप से उपलब्ध होती है, हम अक्सर उसकी उतनी कद्र नहीं कर पाते।’’
रक्षिता के अनुसार, विदेशी साधक योग की बुनियादी बातों को सीखने के लिए भी काफी उत्साहित रहते हैं।
उनका कहना था कि विदेशी प्रतिभागियों के लिए भारत में योग प्रशिक्षण अपेक्षाकृत किफायती पड़ता है, जबकि भारतीयों को यह कुछ महंगा महसूस हो सकता है।
उत्तराखंड पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कोविड के बाद से ऋषिकेश में पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
साल 2021 में यहां कुल 2,92,806 पर्यटक आए थे, जिनमें विदेशी सैलानियों की संख्या 1,576 थी। वहीं साल 2022 में पर्यटकों की कुल संख्या बढ़कर 7,58,081 हो गई, जिसमें विदेशी पर्यटकों की संख्या 1,817 दर्ज की गई। वर्ष 2024 में ऋषिकेश में कुल 9,68,893 पर्यटक पहुंचे, जिनमें 4,857 विदेशी थे।
विदेशी पर्यटकों की संख्या में कोविड के बाद सुधार देखा गया है, फिर भी यह 2019 के पूर्व-कोविड स्तर से कम है। ऋषिकेश में 2019 में 8088 विदेशी पर्यटक आए थे।
आंकड़े बताते हैं कि संख्या के लिहाज से घरेलू पर्यटकों का वर्चस्व है, लेकिन योग और आध्यात्मिक साधना के प्रति गंभीर आकर्षण अब भी विदेशियों में अधिक दिखाई देता है।
भाषा प्रचेता नरेश
सिम्मी नेत्रपाल
नेत्रपाल