आरएसएस से संबद्ध संगठन ने अरावली समिति की अधिसूचना पर उठाए सवाल

आरएसएस से संबद्ध संगठन ने अरावली समिति की अधिसूचना पर उठाए सवाल

आरएसएस से संबद्ध संगठन ने अरावली समिति की अधिसूचना पर उठाए सवाल
Modified Date: August 10, 2026 / 05:18 pm IST
Published Date: August 10, 2026 5:18 pm IST

(अलिंद चौहान)

नयी दिल्ली, 10 अगस्त (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध एक सामाजिक कल्याण संगठन ने उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त अरावली समिति को पत्र लिखकर उसके सार्वजनिक परामर्श संबंधी अधिसूचना को लेकर कई मुद्दे उठाए हैं। इनमें सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए पर्याप्त समय नहीं देना तथा संबंधित ग्रामीण समुदायों तक नहीं पहुंच पाना जैसे मुद्दे शामिल हैं।

यह घटनाक्रम पर्यावरण संगठन ‘पीपल फॉर अरावली’ द्वारा परामर्श प्रक्रिया में ऐसी ही कमियों को उजागर किए जाने के कुछ ही दिनों बाद सामने आया है।

उच्चाधिकार प्राप्त समिति को अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और सीमांकन से संबंधित केंद्र सरकार की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा करने का जिम्मा सौंपा गया है। उसे अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त तक सौंपनी है।

यह अधिसूचना 21 जुलाई को जारी हुई थी। इसमें अरावली पर्वतमाला वाले राज्यों समेत विभिन्न हितधारकों से आपत्तियां, सुझाव और विचार मांगे गए थे।

इसमें कहा गया कि आपत्तियां, सुझाव और विचार ‘‘जहां तक संभव हो’’ दस्तावेजी साक्ष्य या सत्यापन योग्य सामग्री के साथ अधिसूचना जारी होने के 21 दिन के भीतर ईमेल या आधिकारिक गूगल फॉर्म के माध्यम से भेजे जाने चाहिए।

आरएसएस से संबद्ध संगठन अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम (एबीवीकेए) ने दो अगस्त को समिति को लिखे पत्र में कहा, ‘‘प्रभावित समुदायों के लिए मुद्दों को समझने, अपनी ग्राम सभाओं और प्रतिनिधियों से परामर्श करने, संबंधित दस्तावेज जुटाने और दस्तावेजी या सत्यापन योग्य सामग्री के आधार पर सुझाव देने के लिए 21 दिन की अवधि पर्याप्त नहीं है।’’

संगठन ने यह भी दावा किया कि संबंधित अधिसूचना का मुख्यधारा और क्षेत्रीय समाचार पत्रों में व्यापक रूप से प्रकाशन नहीं हुआ। खासकर हिंदी और गुजराती समाचार पत्रों में इसे पर्याप्त जगह नहीं दी गई।

एबीवीकेए के अनुसार, जिन राज्यों में अरावली पर्वतमाला फैली हुई है—यानी राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र—वहां बातचीत के लिए मुख्य रूप से इन्हीं भाषाओं का इस्तेमाल किया जाता है।

संगठन ने कहा कि अरावली क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति (एसटी) की बड़ी आबादी रहती है, खासकर राजस्थान और गुजरात में। इनमें ऐसे समुदाय भी शामिल हैं, जो संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों में निवास करते हैं।

एबीवीकेए ने कहा कि समिति की सिफारिशों का इन समुदायों की जमीन, जंगल, जल संसाधनों, आजीविका, पारंपरिक प्रथाओं, संस्कृति और परंपरागत आवास पर सीधा असर पड़ सकता है। इसलिए सार्थक सार्वजनिक परामर्श बेहद जरूरी है।

समिति ने अरावली की पहाड़ियों और पर्वतमाला से जुड़े मामलों पर गौर करने के लिए छह अगस्त से क्षेत्रीय दौरे शुरू किए हैं, जो 10 अगस्त तक जारी रहेंगे।

हालांकि, एबीवीकेए ने दावा किया है कि केवल क्षेत्रीय स्तर पर परामर्श के लिए ही कम से कम 40 दिन की आवश्यकता हो सकती है।

‘पीपल फॉर अरावली’ ने भी पिछले सप्ताह समिति को पत्र लिखा था। संगठन ने कहा कि अरावली पर निर्भर समुदायों के साथ प्रभावी परामर्श और उनकी राय लिये बिना ‘‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति के लिए अपनी रिपोर्ट तैयार करना उचित नहीं होगा।’’

भाषा आशीष सुरेश

सुरेश


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