आरएसएस का ‘वंदे मातरम्’ से कोई नाता नहीं रहा: अशोक गहलोत

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आरएसएस का ‘वंदे मातरम्’ से कोई नाता नहीं रहा: अशोक गहलोत

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  • Publish Date - August 17, 2026 / 01:21 PM IST,
    Updated On - August 17, 2026 / 01:21 PM IST

जयपुर, 17 अगस्त (भाषा) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तथा केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ से संबंध पर सोमवार को सवाल उठाया। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस और उनकी विचारधारा का ‘वंदे मातरम’ से कोई नाता नहीं रहा।

गहलोत का यह बयान भाजपा के उस आरोप के बीच आया है कि कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय राजधानी स्थित पार्टी मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण गायन पर आपत्ति जताई थी। कांग्रेस ने हालांकि इस आरोप से इनकार किया।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने रविवार को चित्तौड़गढ़ में एक सभा में इस मुद्दे को उठाते हुए कांग्रेस व इसके नेताओं पर निशाना साधा था। इसका जिक्र करते हुए गहलोत ने एक बयान में कहा, ‘‘कल चित्तौड़गढ़ में अमित शाह ने वंदे मातरम पर ज्ञान बांटा। यह सुनकर इतिहास के जानकारों को हंसी आई। भाजपा-आरएसएस का वंदे मातरम से क्या संबंध है? यह वही आरएसएस और उनकी विचारधारा है जिसका वंदे मातरम से कभी कोई नाता ही नहीं रहा।’’

उन्होंने कहा ‘‘ आज इतिहास पर प्रवचन दे रहे हैं, यह इनका अपराध बोध है, कुछ और नहीं। इसलिए ये संसद में अब वंदे मातरम को लेकर कानून बना रहे हैं।’’

पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार ‘वंदे मातरम्’ गूंजा। 1905 से यह हर कांग्रेस अधिवेशन की परंपरा बन गया। कांग्रेस के नेता ‘वंदे मातरम’ का उद्घोष करते हुए अंग्रेजों से सीधी टक्कर लेते थे। अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगाया, जुर्माने लगाए, जेल भेजा, लाठियां बरसाईं तब भी कांग्रेसजन और जोश से ‘वंदे मातरम’ गाते रहे। 1937 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर इसका समावेशी स्वरूप अपनाया गया ताकि यह हर भारतीय का साझा गीत बने।

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन आरएसएस का कभी ‘वंदे मातरम’ से कोई लेना देना नहीं रहा। 1925 में आरएसएस के गठन से लेकर 1947 की आजादी तक इन्होंने कभी ‘वंदे मातरम’ को अपना गीत नहीं बनाया।’’

गहलोत के अनुसार जिस गीत के लिए हजारों देशभक्त फांसी चढ़े, जेल गए, लाठियां खाईं, अंग्रेजों के डर से उसे गाने की हिम्मत आरएसएस कभी नहीं जुटा पाया। उन्होंने कहा ‘‘इसके बजाय 1939 में जब पूरा देश वंदे मातरम गाकर अंग्रेजों से लोहा ले रहा था, आरएसएस ने अपने लिए अलग प्रार्थना ‘नमस्ते सदा वत्सले’ गढ़ ली जिससे अंग्रेजी सरकार आरएसएस से नाराज न हो जाए।’’

पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया, ‘‘जब 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में देश का बच्चा-बच्चा, बूढ़ा-जवान सड़कों पर अंग्रेजों के खिलाफ उतर पड़ा, आरएसएस उस आंदोलन से दूर रहकर अंग्रेजों की खुशामद में लगा रहा।’’

उन्होंने कहा कि यही वजह है कि आजादी के बाद देश की जनता ने दशकों तक इन्हें सत्ता से दूर रखा।

केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, ‘‘अब सत्ता में आकर यह अपने इतिहास के पन्ने बदलना चाहते हैं, ताकि अपने दागों को धो सकें। पर याद रखिए, भाषणों से इतिहास नहीं बदलता। देश की जनता सब जानती है, इनके यह पाप ऐसे धुलने वाले नहीं हैं।’’

भाषा पृथ्वी मनीषा

मनीषा