नयी दिल्ली, 17 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिसमें एक बेटे ने आरोप लगाया है कि उसकी मां के पश्चिम बंगाल की स्थायी निवासी होने और उसके (महिला के) दादा का नाम 1952 की सूची में दर्ज होने के बावजूद उसे ‘‘अवैध रूप से’’ बांग्लादेश निर्वासित कर दिया गया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर और अधिवक्ता प्रसन्ना एस. ने शाहिन अख्तर की ओर से पैरवी की जिन्होंने अपनी मां को हिरासत में लिए जाने और उन्हें जबरन भारत से बांग्लादेश भेजे जाने को चुनौती दी है।
याचिका में दो मई 2025 की ‘‘अवैध बांग्लादेशी नागरिकों/रोहिंग्याओं के निर्वासन के संबंध में प्रक्रिया’’ शीर्षक वाली मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) की वैधता को चुनौती दी है। साथ ही याचिका में ‘आप्रवासन और विदेशी आदेश, 2025’ को भी यह कहते हुए चुनौती दी गई है कि यह कानून, संविधान द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपायों के बिना भारत के भीतर पकड़े गए व्यक्तियों को देश से बाहर निकालने की अनुमति देता है या उसमें सहायता करता है।
याचिका में दावा किया गया कि महिला हमेशा से भारत में कानूनी रूप से रही है और उसने कभी अवैध रूप से देश में प्रवेश नहीं किया। इसमें कहा गया कि महिला को उस देश से गलत तरीके से और जबरन बाहर भेजा गया, जिससे उसका हमेशा वैध तौर पर संबंध रहा है।
याचिका के अनुसार, महिला उत्तर 24 परगना के गोविंदापुर की स्थायी निवासी है। महिला की पहचान और नागरिक दस्तावेज तथा ऐतिहासिक मतदाता रिकॉर्ड पश्चिम बंगाल से उसके लंबे संबंध का समर्थन करते हैं। महिला के दादा बादशा गाजी का नाम 1952 की मतदाता सूची में, जबकि उसके माता-पिता के नाम 2002 की मतदाता सूची में दर्ज है।
इसमें कहा गया कि बाद में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान महिला का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया। इस फैसले को सक्षम न्यायाधिकरण के समक्ष चुनौती दी गई है और मतदाता सूची से नाम हटाया जाना उसकी राष्ट्रीयता का निर्धारण नहीं करता।
याचिका में दावा किया गया कि महिला करीब 20 वर्ष पहले अपने पति के साथ रोजगार की तलाश में मुंबई गई थी और वहां घरेलू कामगार के रूप में काम करती थी।
याचिका के मुताबिक, 19 जुलाई 2026 को मुंबई में पुलिसकर्मी होने का दावा करने वाले लोगों ने महिला को रोक लिया, जबरन हिरासत में लेकर एक निरुद्ध केंद्र में ले गए। उसके पहचान संबंधी दस्तावेज और मोबाइल फोन भी ले लिए गए।
याचिका में कहा गया कि महिला की राष्ट्रीयता की निष्पक्ष जांच नहीं की गई और उसे भारतीय नागरिकता साबित करने का प्रभावी अवसर नहीं दिया गया।
याचिका में दावा किया गया कि महिला को 100 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया और इस दौरान उसे न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया, हिरासत के कारण नहीं बताए गए, कानूनी प्रतिनिधित्व तक पहुंच नहीं दी गई और परिवार से संपर्क भी नहीं करने दिया गया।
इसमें कहा गया कि करीब पांच दिन बाद उसे सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को सौंप दिया गया। उसे पूर्वोत्तर क्षेत्र की ओर ले जाया गया और बीएसएफ की हिरासत में अंतरराष्ट्रीय सीमा तक ले जाकर जबरन बांग्लादेश में ‘‘पुश-आउट’’ कर दिया गया।
याचिका में केंद्र और अन्य संबंधित अधिकारियों को महिला को बांग्लादेश से सुरक्षित, तत्काल और बिना शर्त भारत वापस लाकर अदालत के समक्ष पेश करने तथा उसे स्वतंत्र करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
भाषा राखी पवनेश
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