नयी दिल्ली, तीन जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने तीन निजी बिजली वितरण कंपनियों का कैग ऑडिट कराने के दिल्ली सरकार के आदेश पर शुक्रवार को रोक लगा दी।
दिल्ली सरकार ने यह ऑडिट कराने का फैसला इसलिए लिया था क्योंकि वर्षों से 38,500 करोड़ रुपये की बड़ी राशि नियामकीय परिसंपत्तियों (आरए) के रूप में जमा है, जो उपभोक्ताओं से वसूली जानी है।
न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और कहा कि दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (डीईआरसी) द्वारा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) को ऑडिट की जिम्मेदारी देने का फैसला कानूनी रूप से सही है या नहीं, इसका फैसला अदालत करेगी।
भाजपा नीत दिल्ली सरकार को झटका देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘अगले आदेश तक बिजली अपीलीय अधिकरण (एपीटीईएल) द्वारा ऑडिट के लिए किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट की नियुक्ति के निर्देश पर रोक रहेगी। इस बीच कैग भी ऑडिट की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाएगा।’’
शीर्ष अदालत डीईआरसी की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें डीईआरसी ने एपीटीईएल के अप्रैल के फैसले को चुनौती दी थी।
एपीटीईएल ने कहा था कि ऑडिट का काम कैग को सौंपना कानूनी व्यवस्था के विपरीत है। एपीटीईएल ने ऑडिट के लिए एक स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करने का निर्देश दिया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि 15 जुलाई तक यथास्थिति बनाए रखी जाए। इसी दिन डीईआरसी की याचिका पर नियमित पीठ सुनवाई करेगी, जिसने पिछले साल अगस्त में फैसला सुनाया था।
पिछले साल अगस्त में न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली की तीन निजी बिजली वितरण कंपनियों को तीन साल के अंदर 27,200 करोड़ रुपये की नियामकीय परिसंपत्तियों का भुगतान करने का निर्देश दिया था।
पीठ ने उस समय कहा था कि भविष्य में बिजली बिलों के जरिए वसूली जाने वाली बिजली कंपनियों की धनराशि यानी नियामकीय परिसंपत्तियों (आरए) में तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
इसने कहा था कि 31 मार्च 2024 तक बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड (बीआरपीएल) की यह राशि 12,993 करोड़ रुपये, बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड (बीवाईपीएल) की 8,419 करोड़ रुपये और टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (टीपीडीडीएल) की 5,787 करोड़ रुपये थी। इस तरह कुल राशि 27,200 करोड़ रुपये हो गई थी।
साल 2025 में यह फैसला तीन बिजली वितरण कंपनियों की याचिकाओं पर आया था, जो उन्होंने डीईआरसी के बिजली दरों से जुड़े आदेशों के खिलाफ दायर की थीं। इन आदेशों के कारण नियामकीय परिसंपत्तियों की राशि लगातार बढ़ती गई। फिलहाल नियामकीय परिसंपत्तियों की कुल राशि 38,500 करोड़ रुपये है।
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान डीईआरसी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उपराज्यपाल ने एपीटीईएल द्वारा बताई गई प्रक्रिया संबंधी आवश्यकताओं का पालन करते हुए कैग ऑडिट को मंजूरी दी है।
उन्होंने कहा कि सरकार की चिंता यह है कि जब तक ऑडिट से यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि ये देनदारियां कैसे जमा हुईं, तब तक उपभोक्ताओं पर नियामकीय परिसंपत्तियों की वसूली का बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।
पीठ ने पूछा कि जब अपील केवल कैग को लेखापरीक्षक नियुक्त करने की वैधता तक सीमित है, तो नियामकीय परिसंपत्तियों के परिसमापन का मुद्दा इसमें कैसे आया।
वहीं, एक बिजली कंपनी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने कहा कि ऑडिट और नियामकीय परिसंपत्तियों की वसूली दो अलग-अलग मुद्दे हैं।
पिछले साल के फैसले का उल्लेख करते हुए सिंघवी ने कहा कि नियामकीय परिसंपत्तियों के परिसमापन का रोडमैप पहले ही 2031 तक तय किया जा चुका है और मौजूदा कार्यवाही केवल कैग को ऑडिट की जिम्मेदारी दिए जाने की वैधता तक सीमित है।
दिल्ली सरकार ने वर्षों से जमा हुए 38,500 करोड़ रुपये की नियामकीय परिसंपत्तियों के मुद्दे को देखते हुए बृहस्पतिवार को बिजली वितरण कंपनियों के कैग ऑडिट का आदेश दिया था।
सरकार ने कहा कि कैग उन परिस्थितियों का ‘‘सख्त और गहन’’ ऑडिट करेगा, जिनके कारण तीनों डिस्कॉम कंपनियां नियामकीय परिसंपत्तियों की वसूली किए बिना काम करती रहीं।
सरकार ने कैग को ऑडिट पूरा करने के लिए आदेश की तारीख से तीन महीने का समय दिया है, जिसे जरूरत पड़ने पर बढ़ाया भी जा सकता है।
साल 2002 में बिजली वितरण के निजीकरण के बाद यह पहली बार है जब सरकार ने निजी बिजली वितरण कंपनियों के कैग ऑडिट का आदेश दिया है।
अप्रैल में एपीटीईएल ने डीईआरसी की कैग ऑडिट कराने की अर्जी खारिज कर दी थी तथा आयोग को तीन सप्ताह में लंबित नियामकीय परिसंपत्तियों के परिसमापन की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था।
भाषा जोहेब नेत्रपाल
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