झाड़ फूंक की आड़ में नाबालिग का यौन उत्पीड़न; मौलवी को अदालत का जमानत देने से इंकार

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झाड़ फूंक की आड़ में नाबालिग का यौन उत्पीड़न; मौलवी को अदालत का जमानत देने से इंकार

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  • Publish Date - May 6, 2026 / 07:57 PM IST,
    Updated On - May 6, 2026 / 07:57 PM IST

नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने झाड़-फूंक के जरिए इलाज करने की आड़ में कथित रूप से एक नाबालिग लड़की का यौन उत्पीड़न करने वाले मौलवी को जमानत देने से इंकार कर दिया।

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी। आरोपी खुद को मौलवी बताता था और झाड़-फूंक से उपचार करता था। न्यायालय ने कहा कि आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री तथा मुकदमे की वर्तमान अवस्था को देखते हुए उसे किसी प्रकार की राहत देने का कोई आधार नहीं बनता।

यह मामला वर्ष 2019 का है, जब 17 वर्षीय पीड़िता के परिवार वाले उसे आरोपी के पास ले गए थे क्योंकि उन्हें लग रहा था कि उस पर किसी बुरी आत्मा या जिन्न का साया है। पीड़िता उस वक्त अस्वस्थ थी।

इसके बाद, मौलवी पीड़िता के घर आया और उसने अकेले में उसका इलाज करने की बात कही। साथ ही उसने कहा कि जिन्न सिर्फ अश्लील हरकतों से ही उसके शरीर से निकल सकता है और इसके बाद उसने उसका यौन उत्पीड़न किया।

आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) तथा यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम की धारा चार के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।

अपने निर्णय में न्यायालय ने कहा कि अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया यह दर्शाती है कि आरोपी ने पीड़िता की कमजोर शारीरिक और मानसिक स्थिति तथा उसके परिवार द्वारा उस पर किए गए अंधविश्वास का अनुचित लाभ उठाया।

अदालत ने 29 अप्रैल को पारित आदेश में कहा, “पीड़िता एक युवा लड़की थी जो बीमारी से ग्रस्त थी, और उसे तथा उसके परिवार को यह विश्वास दिलाया गया था कि आरोपी आध्यात्मिक उपचार के माध्यम से उसे ठीक कर सकता है। लेकिन किसी भी प्रकार की सहायता करने के बजाय, आरोपी ने उस विश्वास का दुरुपयोग किया और उपचार के बहाने पीड़िता का शोषण किया।”

अदालत ने कहा, “आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, अभिलेख पर रखी गई सामग्री तथा मुकदमे की अवस्था को देखते हुए, इस न्यायालय को आरोपी को जमानत देने का कोई आधार नहीं मिलता। अतः वर्तमान जमानत याचिका खारिज की जाती है।”

अदालत ने यह भी कहा कि मुकदमा अग्रिम चरण में है और सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि सामान्यतः बलात्कार मामलों में, जब मुकदमा शुरू हो जाता है और अभियोजन पक्ष गवाहों के बयान दर्ज करना प्रारंभ कर देता है, तब जमानत याचिकाओं पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

भाषा रंजन नरेश

नरेश