नयी दिल्ली, 19 अगस्त (भाषा) केंद्र सरकार ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि नागरिकता को लेकर संदेह के आधार पर पश्चिम बंगाल से बांग्लादेश भेजे गए कुछ बांग्ला भाषी लोगों को भारत वापस लाया गया है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के उन निर्देशों को चुनौती देने वाली केंद्र की याचिकाओं का निपटारा कर दिया, जिनमें बांग्ला भाषी कुछ लोगों को वापस भारत लाने का निर्देश दिया गया था।
बांग्लादेश भेजे गए कुछ लोगों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने पीठ को बताया कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के हस्तक्षेप से तत्काल समस्या का समाधान हो गया।
हेगड़े ने कहा, ‘‘ मैं उनके (सॉलिसिटर जनरल) हस्तक्षेप के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं। मामला अपने आप सुलझ गया है। वे सभी वापस आ गए हैं।’’
पीठ ने इस दलील को रिकॉर्ड में लेते हुए कहा कि उसे बताया गया है कि विशेष मामले के तौर पर प्रतिवादियों को वापस लाया गया है।
इसने कहा कि चूंकि संबंधित लोग भारत लौट आए हैं, इसलिए कार्यवाही को लंबित रखने का कोई कारण नहीं है और याचिकाओं का निपटारा किया जाता है।
पीठ ने हालांकि स्पष्ट किया कि मामले में उठे कानूनी सवाल को खुला रखा गया है।
केंद्र ने 22 मई को पीठ को बताया था कि उसने पहले बांग्लादेश भेजे गए कुछ लोगों को भारत वापस लाने और फिर उनके भारतीय नागरिक होने के दावे की पुष्टि करने का फैसला किया है।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए तथा इसे भविष्य के अन्य मामलों में उदाहरण नहीं मानते हुए सरकार ने उन्हें वापस लाने का फैसला किया है।
मेहता ने कहा था, ‘‘सरकार उन्हें वापस लाएगी और इसके बाद उनकी स्थिति की जांच करेगी। जांच के परिणाम के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।’’
शीर्ष अदालत कलकत्ता उच्च न्यायालय के 26 सितंबर, 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली केंद्र की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के सुनाली खातून और अन्य लोगों को बांग्लादेश भेजने के फैसले को रद्द कर दिया था और इसे अवैध करार दिया था।
पिछले साल तीन दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने ‘मानवीय आधार’ पर खातून और उनके आठ वर्षीय बच्चे को भारत में प्रवेश की अनुमति दी थी। उन्हें कुछ महीने पहले बांग्लादेश भेज दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को नाबालिग बच्चे की देखभाल करने का निर्देश दिया था और बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को गर्भवती खातून को निशुल्क प्रसव समेत हर संभव चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने को कहा था।
पिछले साल 26 सितंबर को उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की रहने वाली खातून और स्वीटी बीबी तथा उनके परिवारों को ‘अवैध प्रवासी’ बताकर बांग्लादेश भेजने के केंद्र के फैसले को रद्द कर दिया था।
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