राज्य हाथियों की आवाजाही वाले रास्ते में अवरोध पैदा नहीं कर सकते: न्यायालय

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राज्य हाथियों की आवाजाही वाले रास्ते में अवरोध पैदा नहीं कर सकते: न्यायालय

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  • Publish Date - August 17, 2026 / 05:56 PM IST,
    Updated On - August 17, 2026 / 05:56 PM IST

नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह देश भर में सर्वेक्षण करके यह पता लगाए कि क्या किसी राज्य ने ‘एलिफेंट कॉरिडोर’ में कोई अवरोध उत्पन्न किया है और यदि ऐसा हुआ है तो यह स्वीकार्य नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि राज्य फसल और आजीविका के नुकसान को रोकने के लिए हाथियों की आवाजाही के रास्ते में अवरोध पैदा नहीं कर सकते।

पीठ ने कहा, ‘‘हाथियों की आवाजाही के रास्ते में किसी भी तरह की रुकावट डालना या अवरोध पैदा करना मंजूर नहीं है। हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है कि वन्यजीवों के रास्ते में कोई अवरोध नहीं होना चाहिए। हाथियों के झुंड लंबी दूरी तक यात्रा करते हैं। कोई भी राज्य यह नहीं कह सकता कि फसलें बर्बाद हो रही हैं, इसलिए उन्हें हाथियों की आवाजाही के रास्ते में अवरोधकों का निर्माण करना होगा।’’

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि पश्चिम बंगाल में ‘फायरबॉल’ और ‘स्पाइक्स’ का इस्तेमाल इसलिए होता है क्योंकि हाथी नेपाल से आते हैं और पश्चिम बंगाल होते हुए झारखंड और दूसरे राज्यों में जाते हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हरियाणा के यमुनानगर इलाके में हाथी हैं और वहां से वे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जाते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘कोई भी राज्य उनका रास्ता नहीं रोक सकता।’’

न्यायालय ने हाथियों को भगाने के लिए किसी भी तरह के ‘फायरबॉल’ या मशाल के इस्तेमाल पर रोक लगा दी और राज्य के अधिकारियों से उसके निर्देशों को लागू करने को कहा है।

केंद्र को छह हफ्ते में अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश देते हुए, पीठ ने कहा कि अलग-अलग राज्यों से गुजरने वाले हाथी गलियारों (एलिफेंट कॉरिडोर) को निर्बाध रूप से चालू रखने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने पहले ही जरूरी दिशानिर्देश जारी कर रखे हैं।

न्यायालय ने कहा, ‘‘हालांकि, कुछ स्थानीय कारणों से एलिफेंट कॉरिडोर में रुकावटें आई हैं या उन्हें ब्लॉक किया गया है। हम भारत सरकार और संबंधित मंत्रालय को निर्देश देते हैं कि वे एक नया सर्वे करें और एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपें। इस रिपोर्ट में ऐसी रुकावटों को रोकने के लिए उनके द्वारा उठाए गए कदम और शुरू की गई पहल की जानकारी भी शामिल होनी चाहिए।’’

पीठ ने कहा कि वस्तु स्थिति रिपोर्ट में ‘फायरबॉल’ और मशाल के इस्तेमाल या वन्यजीवों के खिलाफ किसी भी तरह की क्रूर कार्रवाई के बारे में भी जानकारी दी जाए।

याचिकाकर्ता और कार्यकर्ता प्रेरणा सिंह बिंद्रा तथा अन्य लोगों की ओर से पेश वकील ने कहा कि हाथियों के झुंड का पीछा भीड़ की तरह किया जाता है, जिससे समस्या और बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा कि हाथियों की स्वाभाविक आवाजाही के दौरान उनके खिलाफ आग्नेयास्त्र, आग के गोले और मशालों के इस्तेमाल को रोकने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे उपाय किए जाने चाहिए और छह हफ्ते में दाखिल की जाने वाले वस्तु स्थिति रिपोर्ट के जरिए न्यायालय को इसकी जानकारी दी जाए। 14 नवंबर 2024 को शीर्ष अदालत उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया थी जिसमें न्यायालय के आदेशों के कथित उल्लंघन के लिए अवमानना ​​की कार्रवाई शुरू करने का अनुरोध किया गया था। न्यायालय ने राज्य के अधिकारियों को आदेश दिया था कि वे मानव बस्तियों या खेतों के पास आने वाले हाथियों को भगाने के लिए ‘फायरबॉल’ का इस्तेमाल न करें।

पीठ ने पश्चिम बंगाल के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन बल प्रमुख) को नोटिस जारी कर याचिका पर उनका जवाब मांगा और मामले की सुनवाई चार हफ्ते बाद के लिए निर्धारित कर दी।

भाषा सुभाष नरेश

नरेश