न्यायालय ने साइबर अपराध रोकने संबंधी याचिका पर केंद्र से विचार करने को कहा

न्यायालय ने साइबर अपराध रोकने संबंधी याचिका पर केंद्र से विचार करने को कहा

न्यायालय ने साइबर अपराध रोकने संबंधी याचिका पर केंद्र से विचार करने को कहा
Modified Date: August 11, 2026 / 05:04 pm IST
Published Date: August 11, 2026 5:04 pm IST

नयी दिल्ली, 11 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार से एक अभ्यावेदन पर विचार करने को कहा, जिसमें गंभीर साइबर अपराधों से निपटने के लिए सुधारात्मक कदम उठाने का अनुरोध किया गया है। इनमें शारीरिक हिंसा की धमकियां, बच्चों के स्कूल के स्थान जैसी निजी जानकारी का खुलासा और बिना सहमति के अंतरंग सामग्री साझा करना शामिल हैं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने नरेंद्र कुमार गोस्वामी की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। गोस्वामी ने अदालत में पेश होकर गंभीर और गैरकानूनी डिजिटल नुकसान से निपटने के लिए एक प्रभावी निगरानी तंत्र बनाने का अनुरोध किया।

सुनवाई के दौरान गोस्वामी ने मामले की गंभीरता और तात्कालिकता को रेखांकित करने के लिए एक काल्पनिक स्थिति सामने रखी। उन्होंने सवाल किया कि यदि रात नौ बजे किसी महिला के घर का पता ऑनलाइन पोस्ट कर दुष्कर्म की धमकी दी जाए, तो क्या ऐसी सामग्री को इंटरनेट पर उपलब्ध रहने दिया जा सकता है?

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ता ने साइबर अपराध के विभिन्न तरीकों, प्रकारों और पहलुओं को बहुत अच्छी तरह से रेखांकित किया है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इनकी पहचान कैसे की जाए और इनसे बचाव के लिए क्या कदम उठाए जाएं, यह विशेषज्ञों के विचार का विषय है।’’

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि इन मुद्दों को पहले ही संबंधित अधिकारियों के समक्ष एक अभ्यावेदन के जरिए उठाया जा चुका है।

जब प्रधान न्यायाधीश ने पूछा कि यह अभ्यावेदन किसे दिया गया था, तो गोस्वामी ने बताया कि इसे इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, गृह मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय के सचिवों के माध्यम से केंद्र सरकार को सौंपा गया था।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिका में ‘‘गंभीर गैरकानूनी डिजिटल नुकसान’’ से निपटने के लिए एक प्रभावी निगरानी तंत्र बनाने के निर्देश का अनुरोध किया गया है। इसमें शारीरिक हिंसा के कृत्य या धमकियां, खतरनाक विषैले पदार्थ, बच्चों के स्कूल के स्थान सहित निजी विवरणों का खुलासा, बिना सहमति के अंतरंग सामग्री और हानिकारक डिजिटल प्रतिरूपण जैसे मामले शामिल हैं।

याचिका में कहा गया कि इस तरह के साइबर अपराध समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता, गरिमा और जीवन के अधिकार समेत मौलिक अधिकारों का गंभीर रूप से उल्लंघन करते हैं।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने इन मुद्दों को पहले ही 22 जून को संबंधित मंत्रालयों को दिए गए एक अभ्यावेदन के माध्यम से उठाया था। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर जरूरी सुधारात्मक कदम यह है कि संबंधित अधिकारी अभ्यावेदन में उठाए गए मुद्दों पर विचार करें।

पीठ ने तीनों मंत्रालयों के साथ-साथ अन्य सभी संबंधित पक्षों से अभ्यावेदन में उठाए गए मुद्दों पर गौर करने और आवश्यकतानुसार उचित सुधारात्मक कदम उठाने को कहा।

भाषा आशीष दिलीप

दिलीप


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