नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को निर्मोही अखाड़े की उस पृथक याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र को ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास’ का पुनर्गठन करके उसे एक “सार्वजनिक न्यास” बनाने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। यह न्यास अयोध्या में राम मंदिर के कामकाज का प्रबंधन करता है।
भगवान राम को समर्पित प्राचीन रामानंदी हिंदू मठवासी संप्रदाय, निर्मोही अखाड़े ने अयोध्या राम जन्मभूमि कानूनी विवाद में अहम भूमिका निभाई थी। यह (अखाड़ा) मालिकाना हक के विवाद में मुख्य पक्षकारों में से एक था और रामलला तथा उस जगह के प्रबंधन का अधिकार होने का दावा करता था।
अखाड़े ने हाल ही में उच्चतम न्यायालय का रुख किया और ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास’ में बदलाव का अनुरोध किया। इन बदलावों में अधिक पारदर्शिता लाना, इसे ‘सार्वजनिक न्यास’ का दर्जा देना और मंदिर के कामकाज में खुद के लिए भूमिका हासिल करना शामिल है।
सोमवार को, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने चढ़ावे की चोरी से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) से कहा कि वह अपनी जांच तेजी से पूरी करे और उसे तार्किक नतीजे तक पहुंचाए।
अखाड़े की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील सुशील जैन ने यह निर्देश देने का अनुरोध किया कि न्यास का मौजूदा ढांचा और गठन राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय के नवंबर 2019 के फैसले की भावना और मंशा के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इसे ‘निजी न्यास’ की संज्ञा भी दी।
एक वकील ने बताया कि वह मुख्य मामले में पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के 2019 के फैसले को लागू करने का अनुरोध कर रहे हैं।
जब जैन अपनी दलीलों पर अड़े रहे, तो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘‘(कार्यवाही की) लाइव स्ट्रीमिंग के यही सब खतरे हैं।’’ सीजेआई ने अखाड़े की याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘एक उचित याचिका दायर करें।’’
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