न्यायालय ने मणिपुर हिंसा मामलों के लिए विशेष अदालतों का सुझाव दिया, जांच जल्द पूरी करने के लिए कहा

न्यायालय ने मणिपुर हिंसा मामलों के लिए विशेष अदालतों का सुझाव दिया, जांच जल्द पूरी करने के लिए कहा

न्यायालय ने मणिपुर हिंसा मामलों के लिए विशेष अदालतों का सुझाव दिया, जांच जल्द पूरी करने के लिए कहा
Modified Date: July 24, 2026 / 02:14 pm IST
Published Date: July 24, 2026 2:14 pm IST

नयी दिल्ली, 24 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2023 में मणिपुर में हुई जातीय हिंसा से जुड़े आपराधिक मामलों की प्रतिदिन सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का शुक्रवार को सुझाव दिया।

साथ ही, उसने जांच एजेंसियों को लंबित जांच शीघ्र पूरी करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पीड़ितों को आरोपपत्रों की प्रतियां उपलब्ध करायी जाएं।

भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस तथ्य का संज्ञान लिया कि कई पीड़ितों और उनके परिजनों को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) तथा राज्य के विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा दाखिल आरोपपत्रों की प्रतियां अब तक नहीं मिली हैं।

न्यायालय ने कहा कि विधिक सहायता वकीलों के संपर्क करने के एक सप्ताह के भीतर जांच एजेंसियों को उन्हें आरोपपत्रों की प्रतियां उपलब्ध करानी होंगी।

तीन मई, 2023 को मणिपुर के पहाड़ी जिलों में बहुसंख्यक मेइती समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिए जाने की मांग के विरोध में आयोजित ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ के बाद जातीय हिंसा भड़क उठी थी। तब से अब तक इस हिंसा में 200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, सैकड़ों लोग घायल हुए हैं और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं।

हिंसा से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने पीड़ितों की ओर से पेश विधिक सहायता वकीलों को आरोपपत्रों की प्रतियां प्राप्त करने के लिए गुवाहाटी उच्च न्यायालय और मणिपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों के कार्यालयों से संपर्क करने की अनुमति दी।

वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने पीठ को बताया कि दो मृतकों के परिजनों ने उन्हें सूचित किया है कि न्यायालय के पूर्व निर्देशों के बावजूद उन्हें अब तक आरोपपत्रों की प्रतियां नहीं मिली हैं। उन्होंने कहा कि एक विधिक सहायता वकील को आरोपपत्र की प्रति मिल गई है, जबकि दूसरे वकील अब भी उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

विधि अधिकारी ने स्पष्ट किया कि आरोपपत्र संवेदनशील आपराधिक अभिलेख हैं और इन्हें केवल पीड़ितों तथा उनके वकीलों को उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है, न कि महिला संगठनों या जनहित याचिकाकर्ताओं को।

पीठ ने कहा, ‘‘हमें (वृंदा) ग्रोवर ने बताया है कि हमारे निर्देशों और स्थिति रिपोर्ट के बावजूद पीड़ित परिवारों ने उन्हें सूचित किया है कि उन्हें आरोपपत्रों की प्रतियां उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। वह विधिक सहायता वकीलों से संपर्क करने में सफल रहीं, जिनमें से एक को आरोपपत्र की प्रति मिल गई है, जबकि दूसरे को अब तक नहीं मिली है।’’

पीठ ने आदेश दिया, ‘‘हम विधिक सहायता वकीलों को निर्देश देते हैं कि वे तत्काल मणिपुर और गुवाहाटी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के कार्यालयों से संपर्क करें। संबंधित प्राधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि विधिक सहायता वकीलों के संपर्क करने की तारीख से एक सप्ताह के भीतर उन्हें आरोपपत्रों की प्रतियां उपलब्ध करा दी जाएं।’’

आपराधिक मामलों की प्रतिदिन सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का सुझाव देते हुए पीठ ने राज्य सरकार, एसआईटी और सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से उन मामलों का ब्योरा एकत्र करने को कहा, जिनमें जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं। साथ ही, उन मामलों का विवरण भी देने को कहा गया, जिनकी जांच अभी लंबित है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जांच में हो रही अत्यधिक देरी को देखते हुए वह मणिपुर सरकार तथा मणिपुर उच्च न्यायालय और गुवाहाटी उच्च न्यायालय की सहमति से मामलों की प्रतिदिन सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का अंतरिम रूप से प्रस्ताव कर रहा है।

पीठ ने कहा, ‘‘यह तभी संभव होगा जब सीबीआई और एसआईटी जांच पूरी कर आरोपपत्र दाखिल कर दें। हम दोनों एजेंसियों पर जोर देते हैं कि वे अपना सर्वोत्तम प्रयास करें और जांच शीघ्र पूरी करें।’’

पीठ ने मणिपुर सरकार को भी निर्देश दिया कि वह जांच एजेंसियों को पूरा सहयोग और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराए।

न्यायालय ने सीबीआई, राज्य एसआईटी और न्यायालय द्वारा नियुक्त निगरानी समिति को हिंसा से जुड़े मामलों पर नयी स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। इस समिति की अध्यक्षता महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दत्तात्रेय पडसलगीकर कर रहे हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘हमने (अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल) ऐश्वर्या भाटी से उन सभी प्राथमिकियों का ब्योरा एकत्र करने को भी कहा है, जिनमें जांच लंबित है या आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं। इससे मुकदमों की संभावित संख्या का अनुमान लगेगा। यह तय करने के लिए महत्वपूर्ण है कि कितनी अदालतों की आवश्यकता होगी।’’

इसके अलावा, न्यायालय ने मणिपुर उच्च न्यायालय को जातीय हिंसा के बाद लापता हुए 30 लोगों से संबंधित मामलों पर भी विचार करने को कहा।

पीठ ने दाखिल स्थिति रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि सीबीआई ने 21 मामलों में आरोपपत्र दाखिल कर दिए हैं, जबकि 11 अन्य मामलों में जांच जारी है।

पीठ ने कहा कि सीबीआई की तीन मामलों में दाखिल ‘क्लोजर रिपोर्ट’ स्वीकार कर ली गई है, जबकि चार मामले अब भी जांच के अधीन हैं।

न्यायालय ने कहा कि राज्य एसआईटी आठ जिलों में दर्ज 3,020 मामलों की जांच कर रही है। एसआईटी के अनुसार, 301 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं और 10 मामलों में मुकदमे की सुनवाई शुरू हो चुकी है।

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि राज्य एसआईटी ने इन मामलों में लगभग 2,924 गवाहों को सूचीबद्ध किया है।

पीठ ने कहा कि सीबीआई ने जांच में आने वाली कई व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर भी ध्यान दिलाया है। इनमें गवाहों का विस्थापन, आपसी अविश्वास के कारण सहयोग का अभाव, भाषा संबंधी बाधाएं तथा हिंसा के दौरान लंबे समय तक इंटरनेट सेवा बंद रहने के कारण डिजिटल साक्ष्य एकत्र करने में आई बाधाएं शामिल हैं।

इन व्यावहारिक कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि लंबित जांच उचित समय-सीमा के भीतर पूरी की जानी चाहिए।

भाषा गोला वैभव

वैभव


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