कोलकाता, 27 जुलाई (भाषा) पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी मंगलवार को नयी दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के उन 20 बागी सांसदों से दूसरी बार मिल सकते हैं, जो कम जानी-मानी पार्टी एनसीपीआई में शामिल हो गए थे। इस मुलाकात से इस संसदीय गुट के भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं, जिसमें भाजपा के साथ इसके संभावित विलय की बात भी शामिल है।
बीरभूम की सांसद शताब्दी रॉय ने कहा कि बैठक अपराह्न एक बजे पश्चिम बंगाल सरकार के अतिथि गृह, बंग भवन में होगी।
रॉय ने कहा, “हमारे कई सांसदों के पास कुछ जरूरी मामलों को लेकर सवाल हैं और वे उन पर स्पष्टीकरण चाहते हैं; वे इन मामलों को मुख्यमंत्री के सामने रख सकते हैं। साथ ही, उनके पास मुख्यमंत्री के सामने रखने के लिए कुछ मुद्दे और सुझाव भी हो सकते हैं।”
हाल के दिनों में भाजपा के साथ संभावित विलय को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। खबरों के अनुसार, नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) का नेतृत्व अपनी भविष्य की संगठनात्मक रणनीति पर विचार कर रहा है। हालांकि, न तो एनसीपीआई और न ही भाजपा ने आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि की है कि मंगलवार की बैठक के एजेंडे में विलय शामिल है।
यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अभी तक इन 20 बागी सांसदों के दल-बदल को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी है, हालांकि सदन में उनके बैठने की व्यवस्था बदल दी गई है।
ममता बनर्जी के प्रति वफादार तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसदों के गुट ने दलबदल विरोधी कानून के तहत बागी सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग की है।
इस मांग को जोरदार ढंग से रखने के लिए, ममता के करीबी अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी और महुआ मोइत्रा ने सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की। इसके बाद अभिषेक ने बिरला को लिखित संदेश भेजकर दल-बदलुओं के खिलाफ लंबित याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने का आग्रह किया।
बागी गुट की सदस्य और सांसद शर्मिला सरकार ने विलय की चर्चाओं पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें मुख्यमंत्री के साथ बैठक बुलाए जाने के अलावा और कोई जानकारी नहीं है।
उन्होंने फिर से कहा कि कोई भी फैसला नेतृत्व के साथ बातचीत के बाद ही लिया जाएगा।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भविष्य के चुनावों से पहले भाजपा के साथ औपचारिक विलय का कोई भी फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति पर गहरा असर डालेगा।
साथ ही, उन्होंने चेताया कि मंगलवार की बैठक किसी तत्काल राजनीतिक पुनर्गठन के बजाय संसदीय समन्वय और संगठनात्मक मामलों पर चर्चा तक ही सीमित रह सकती है।
भाषा
प्रशांत दिलीप
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