नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा) रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख समीर वी. कामत ने मंगलवार को कहा कि सामग्री विकास के क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके चक्र में 10-15 साल लगते हैं, जबकि प्रणाली विकास का चक्र ‘‘लगातार सिकुड़ रहा है’’।
उन्होंने यहां सुब्रतो पार्क में आयोजित एक रक्षा संगोष्ठी में कहा कि जब तक सामग्री विकास चक्र, प्रणाली विकास चक्र के साथ ‘‘कदम से कदम मिलाकर’’ नहीं चलता, तब तक किसी भी नयी सामग्री को शामिल करना ‘‘एक और भी बड़ी चुनौती’’ होगा।
डीआरडीओ अध्यक्ष ने कहा, ‘‘सामग्रियां प्रमुख सक्षम कारक हैं, चाहे वे प्रणालियों, हथियारों या सेंसर के लिए हों। यदि आप अपनी वर्तमान क्षमताओं से बढ़कर क्षमताएं चाहते हैं, तो आपको ऐसी सामग्रियां विकसित करनी होंगी जो वह क्षमता प्रदान कर सकें।’’
उन्होंने भारत को सामग्री विकास की प्रौद्योगिकी के लिए विदेशी देशों पर निर्भर रहने के प्रति आगाह किया।
कामत ने कहा, ‘‘आपको यह नहीं मिलेगी। वे आपको यह प्रौद्योगिकी तभी देंगे, जब वे इसे अपनी प्रणाली में इस्तेमाल कर चुके होंगे। और, जब वे अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकी पर चले जाएंगे, तब वे आपको अपनी प्रणाली बनाने के लिए ज़रूरी प्रौद्योगिकी के अलग-अलग हिस्से देंगे।’’
डीआरडीओ प्रमुख ने सामग्री विकास क्षेत्र के समक्ष आने वाली विभिन्न चुनौतियों को रेखांकित करते हुए कहा, ‘‘तो अगर आपकी आत्मनिर्भर बनने और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी बनने की कोई महत्वाकांक्षा है, तो यह एक ऐसा क्षेत्र है-एकमात्र क्षेत्र नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षेत्र -जिस पर देश को ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सामग्री विकास चक्र 10 से 15 साल का होता है। अगर आप देखें, तो प्रणाली विकास चक्र लगातार छोटा होता जा रहा है। आज, हर पांच साल में नयी प्रणालियां आ जाती हैं, और ड्रोन जैसे क्षेत्रों में, हर कुछ साल में या हर साल चीज़ें बदल जाती हैं।’’
डीआरडीओ अध्यक्ष ने कहा, ‘‘इसलिए, जब तक सामग्री विकास चक्र, प्रणाली विकास चक्र के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलता, तब तक नयी सामग्री को जुटाना अधिक कठिन होता जाएगा।’’
कामत रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव भी हैं।
उन्होंने कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि अगले पांच से दस वर्षों में सामग्री समुदाय सामग्री चक्र को छोटा करने में सक्षम हो जाएगा।
कामत ने कहा, ‘‘सामग्री तैयार करने के बाद, अगली चुनौती उन्हें उस उत्पाद के रूप में बदलना है जिसकी आपको आवश्यकता है। यहीं पर विनिर्माण की भूमिका आती है।’’
अपने संबोधन में, डीआरडीओ प्रमुख ने हितधारकों से सामग्री निर्माण में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण कच्चे माल के क्षेत्र में काम करने का भी आग्रह किया।
उन्होंने कहा, “देखिए, आज हमारे पास मैग्नेट प्रौद्योगिकी तो है, लेकिन हमारे पास दुर्लभ खनिज नहीं हैं। दुनिया के 90 प्रतिशत दुर्लभ खनिजों पर चीन का नियंत्रण है। और नियोडिमियम, आयरन तथा बोरॉन मैग्नेट में इस्तेमाल होने वाले भारी दुर्लभ खनिजों पर तो चीन का 99 प्रतिशत दबदबा है।’’
कामत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर आगे चलकर अपनी पहचान बनानी है, तो इस चीज़ को समग्र रूप से देखने की ज़रूरत है।
उन्होंने कहा, “मुझे पूरा यकीन है कि आत्मनिर्भरता पर सरकार के बढ़ते ज़ोर के साथ, इन सभी मुद्दों का समाधान हो जाएगा… और मुझे विश्वास है कि (इस सेमिनार में) आप जो चर्चाएं करेंगे, उनसे एक ऐसा रोडमैप तैयार होगा जिसे आप सरकार के सामने पेश कर सकते हैं, ताकि इसे आगे बढ़ाया जा सके।”
इस संगोष्ठी का आयोजन थिंक-टैंक ‘सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज़’ और ‘इंडियन मिलिट्री रिव्यू’ प्रकाशन द्वारा किया जा रहा है।
भाषा नेत्रपाल पवनेश
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