नयी दिल्ली, 25 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय में बुधवार को एक मामले में सुनवाई के दौरान दलील दी गई कि ‘पहले से’ पर्यावरण मंजूरी देना महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ठोस सुरक्षा उपाय है और ‘प्रदूषक कीमत चुकाएं’ के सिद्धांत को ‘प्रदूषण करो और फिर भुगतान करो’ में नहीं बदला जाना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के समक्ष यह दलील वरिष्ठ अधिवक्ता सृष्टि अग्निहोत्री ने दी।
अग्निहोत्री ने उस विचार का विरोध किया, जिसके तहत पर्यावरण संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को भारी जुर्माना चुकाने पर पिछली तारीख से पर्यावरण मंजूरी दे दी जाती है।
अग्निहोत्री ने जब रियो घोषणापत्र और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों तथा उनके प्रस्तावों का हवाला दिया, तो पीठ ने कहा, ‘‘रियो घोषणा पत्र, पेरिस संधि और पर्यावरण संबंधी सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सामने यह चुनौती है कि विभिन्न राष्ट्र उनसे बचने की कोशिश कर रहे हैं।’’
न्यायालय ने कहा कि अमेरिका और चीन जैसे देश इन संधियों के प्रति उदासीन हैं और शायद ही कुछ करते हैं।
शीर्ष अदालत इस समय उन याचिकाओं के एक समूह पर फिर से सुनवाई कर रही है, जिनमें ‘वनशक्ति’ फैसले को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिकाएं भी शामिल हैं।
न्यायालय के 2025 के फैसले ने शुरू में केंद्र को उन परियोजनाओं को पिछली तारीख से मंजूरी देने से रोक लगा दी थी, जिनमें अनिवार्य पर्यावरणीय स्वीकृतियों के बिना ही काम शुरू कर दिया गया था। हालांकि न्यायालय ने बाद में इस फैसले के अमल पर रोक लगा दी, ताकि सार्वजनिक निवेश के रूप में लगे हजारों करोड़ रुपये बर्बाद होने से बचाए जा सकें।
पिछले साल 18 नवंबर को, तत्कालीन प्रधान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने 2:1 के बहुमत से एक अंतरिम आदेश के जरिए अपने ही फैसले को पलट दिया और उन परियोजनाओं को पिछली तारीख से पर्यावरण मंजूरी देने का रास्ता साफ कर दिया, जो पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करती पाई गई थीं। पीठ ने कहा था कि ऐसा न करने पर ‘‘हज़ारों करोड़ रुपये बर्बाद हो जाएंगे’’।
न्यायालय ने याचिकाओं पर फिर से सुनवाई का आदेश दिया था।
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को वकीलों की दलीलें सुनीं, जिनमें अग्निहोत्री और केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी शामिल थीं।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुईं अग्निहोत्री ने दलील दी कि ‘पूर्व’ पर्यावरणीय मंजूरी की शर्त महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ठोस सुरक्षा उपाय है।
उन्होंने दलील दी कि एक बार कोई परियोजना शुरू हो जाती है तो उसके बाद, विकल्पों का कोई भी विश्लेषण महज एक ‘कागज़ी कार्रवाई’ बनकर रह जाता है, क्योंकि तब तक नुकसान हो चुका होता है।
अग्निहोत्री ने कहा, ‘‘प्रदूषण फैलाने वाला ही कीमत चुकाए’ के सिद्धांत को ‘प्रदूषण फैलाओ और भुगतान करो’की व्यवस्था में कमज़ोर नहीं किया जाना चाहिए। यह एक खतरनाक परिपाटी होगी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘अगर कोई परियोजना ठीक से सोचे समझे बिना शुरू कर दी गई है या किसी भूकंप-संभावित क्षेत्र या मिट्टी के कटाव वाले इलाके में स्थित हो, तो अंततः जनता का पैसा बर्बाद ही होता है।’’
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भाटी ने सरकार के कार्यालय ज्ञापन का बचाव करते हुए कहा कि यह ‘व्यापक’ नियमितीकरण प्रदान नहीं करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘पर्यावरण संबंधी न्यायशास्त्र को कमज़ोर करने के लिए हमारे पास कोई सिफारिश नहीं है।’’ भाटी ने साथ ही कहा कि सरकार कानून के दायरे का विस्तार करने के लिए प्रतिबद्ध है।
सॉलिसिटर जनरल ने नियामक व्यवस्थाओं के विकास के बारे में विस्तार से बताया और कहा कि उद्योगों या परियोजनाओं की एक ऐसी श्रेणी है, जिन्हें पहले (पर्यावरण मंज़ूरी) की आवश्यकता नहीं होती थी, उन्हें भी अब इसके दायरे में ला दिया गया है।
उन्होंने कहा कि जिन इकाइयों को कानूनी तौर पर संचालित करने की अनुमति थी, उनके लिए भी पहला कदम उन्हें बंद करना है। इसके बाद उन्हें एक विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति द्वारा की जाने वाली कड़ी जांच-पड़ताल से गुज़रना होता है, पर्यावरण संबंधी भारी जुर्माना भरना होता है और अतीत में हुए नुकसान की भरपाई के लिए एक सुधार योजना प्रस्तुत करनी होती है।
इस मामले की अब अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी।
भाषा
धीरज नरेश
नरेश
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