नयी दिल्ली, 12 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु विधानसभा में विश्वास मत के दौरान मतदान में हिस्सा लेने से रोकने संबंधी मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाले टीवीके के एक विधायक की याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है।
तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के नेता सी जोसेफ विजय ने 10 मई को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी।
टीवीके विधायक आर श्रीनिवास सेतुपति की याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने और सुनवाई के लिए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी द्वारा प्रस्तुत किया गया।
पीठ ने मामले की सुनवाई बुधवार को करने पर सहमति जताई।
सेतुपति ने शिवगंगई जिले के नंबर 185 तिरुपत्तुर विधानसभा क्षेत्र में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) नेता एवं पूर्व मंत्री के. आर. पेरियाकरुप्पन के खिलाफ एक मत के अंतर से जीत हासिल की थी।
इसके बाद पेरियाकरुप्पन ने मतगणना प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए मद्रास उच्च न्यायालय का रुख किया था।
उच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में सेतुपति के, तमिलनाडु विधानसभा में विश्वास मत समेत किसी भी मतदान में हिस्सा लेने पर अंतरिम रोक लगा दी।
उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि श्रीनिवास सेतुपति किसी अविश्वास प्रस्ताव पर भी मतदान नहीं कर सकेंगे।
इस आदेश का तमिलनाडु विधानसभा की 234 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ टीवीके के नेतृत्व वाले गठबंधन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।
वर्तमान में इस गठबंधन को 120 विधायकों का समर्थन प्राप्त है।
सेतुपति को मतदान की कार्यवाही में भाग लेने से रोक दिए जाने के कारण, सदन में उसकी प्रभावी संख्या घटकर 119 हो जाएगी।
उच्च न्यायालय के समक्ष, पेरियाकरुप्पन ने आरोप लगाया कि तिरुपत्तुर निर्वाचन क्षेत्र संख्या 185 के लिए भेजा जाने वाला एक डाक मतपत्र गलती से तिरुपत्तुर जिले के तिरुपत्तुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र संख्या 50 में भेज दिया गया था।
उन्होंने कहा कि मतपत्र को विचार के लिए सही निर्वाचन अधिकारी के पास भेजने के बजाय वहीं खारिज कर दिया गया था।
उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की गिनती में कथित विसंगतियों की ओर भी इशारा किया और दावा किया कि मतगणना रिकॉर्ड और निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर प्रकाशित आंकड़ों के बीच 18 मतों का अंतर था।
अंतरिम आदेश पारित करते समय, उच्च न्यायालय ने पाया कि सीमित निर्देश के लिए प्रथमदृष्टया मजबूत मामला बनता है।
हालांकि, इसने स्पष्ट किया कि यह आदेश सेतुपति के निर्वाचन को रद्द नहीं करता और न ही पेरियाकरुप्पन को निर्वाचित घोषित किये जाने का कोई अधिकार प्रदान करता है।
भाषा
देवेंद्र मनीषा
मनीषा