तृणमूल के नाम, चुनाव चिह्न के लिए निर्वाचन आयोग के समक्ष होंगे दोनों गुट

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तृणमूल के नाम, चुनाव चिह्न के लिए निर्वाचन आयोग के समक्ष होंगे दोनों गुट

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  • Publish Date - July 5, 2026 / 09:29 PM IST,
    Updated On - July 5, 2026 / 09:29 PM IST

कोलकाता, पांच जुलाई (भाषा) तृणमूल कांग्रेस पर नियंत्रण की लड़ाई सोमवार को एक निर्णायक दौर में पहुंचने वाली है, क्योंकि विरोधी गुटों के पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठनात्मक ढांचे पर अपना दावा पेश करने के लिए निर्वाचन आयोग के सामने दस्तावेज पेश करने की उम्मीद है।

पार्टी के 28 साल के इतिहास में पहली बार हो रहे इस मुकाबले से राजनीतिक वैधता और संगठनात्मक नियंत्रण के दावों की परीक्षा होने की उम्मीद है, क्योंकि दोनों ही पक्ष खुद को “असली” तृणमूल कांग्रेस के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं।

पिछले हफ़्ते विरोधी गुटों की शुरुआती दलीलें सुनने के बाद, चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से छह जुलाई को शाम 5.30 बजे तक दस्तावेज़, संगठनात्मक रिकॉर्ड और समर्थन के सबूत जमा करने को कहा है।

इस विवाद की जड़ में पार्टी के मशहूर ‘घास-फूल’ वाले चुनाव चिह्न, उसकी संगठनात्मक संपत्ति, निधि और मुख्यालय का भविष्य है। विधानसभा चुनावों में हार के बाद पार्टी में बढ़ी बगावत के कारण इन सभी चीज़ों पर अलग-अलग गुट अपना-अपना दावा कर रहे हैं।

जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले कालीघाट गुट के संगठनात्मक निरंतरता और पार्टी की स्थापना की विरासत पर निर्भर रहने की उम्मीद है, वहीं बागी गुट विधानसभा और चुने हुए प्रतिनिधियों के बीच संख्या-बल पर भरोसा कर रहा है।

यह टकराव पश्चिम बंगाल में हाल के दशकों में देखे गए सबसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक के बीच हो रहा है।

यह संकट शुरू तो विधायी स्तर पर बगावत के तौर पर हुआ था, लेकिन अब यह संगठन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

पिछले महीने, बागी गुट ने एक विशेष सत्र बुलाया, वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष चुना और एक समानांतर राष्ट्रीय नेतृत्व ढांचा पेश किया। उनका तर्क था कि पार्टी के मौजूदा नेतृत्व ने अपने ज़्यादातर चुने हुए प्रतिनिधियों का भरोसा खो दिया है।

बागी नेताओं ने अपनी ताकत तब दिखाई जब तृणमूल के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के उम्मीदवार को खारिज करते हुए, विपक्ष के नेता के पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी के दावे का समर्थन किया। अब इस गुट का दावा है कि उन्हें करीब 65 विधायकों का समर्थन हासिल है।

इसके बाद, काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में लोकसभा के 21 सदस्य ‘नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया’ (एनसीपीआई) में शामिल हो गए, जिससे संसद में ममता बनर्जी की स्थिति काफी कमज़ोर हो गई और राजनीतिक वैधता की लड़ाई में एक नया पहलू जुड़ गया।

शुक्रवार को पार्टी के अंदर चल रही खींचतान में एक नाटकीय मोड़ आया, जब बागी गुट ने कोलकाता में पार्टी मुख्यालय ‘तृणमूल भवन’ पर कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने ताले बदल दिए, नए पोस्टर लगाए और घोषणा की कि अब से वे यहीं से काम करेंगे।

यह कदम उस घटना के ठीक एक दिन बाद उठाया गया, जब बागी गुट ने पार्टी के नेतृत्व, चुनाव चिह्न, संगठनात्मक ढांचे और संपत्ति पर अपना दावा पेश करने के लिए नयी दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार और दो चुनाव आयुक्तों से मुलाकात की थी।

ऋतब्रत गुट के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “हमने सभी दस्तावेजी सबूत इकट्ठा कर लिये हैं और उन्हें आयोग के सामने पेश करेंगे। हमें भरोसा है कि फैसला तथ्यों, आंकड़ों और संगठनात्मक वैधता पर आधारित होगा।”

ममता बनर्जी खेमे ने बागी नेताओं के दावों पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि पार्टी से निकाले गए नेता चुनाव आयोग के सामने पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। उम्मीद है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता सोमवार को आयोग के सामने अपना पक्ष रखेंगे।

कालीघाट खेमे के लिए दांव पर बहुत कुछ लगा है, क्योंकि वरिष्ठ नेता निजी तौर पर यह मानते हैं कि इसके नतीजे पार्टी की भविष्य की राजनीतिक पहचान पर दूरगामी असर डाल सकते हैं।

भाषा प्रशांत सुरेश

सुरेश