भारत में बुजुर्गों की बीमारियों का इलाज काफी नहीं, उन्हें सक्रिय बनाए रखना भी बेहद जरूरी: विशेषज्ञ
भारत में बुजुर्गों की बीमारियों का इलाज काफी नहीं, उन्हें सक्रिय बनाए रखना भी बेहद जरूरी: विशेषज्ञ
नयी दिल्ली, 19 जुलाई (भाषा) भारत में जीवन प्रत्याशा बढ़ी है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ देश की स्वास्थ्य प्रणाली का ध्यान केवल बीमारी का इलाज करके जीवन अवधि बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करने पर भी होना चाहिए कि बुजुर्ग स्वस्थ, चलने-फिरने में सक्षम और आत्मनिर्भर बने रहें।
अनुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 34.7 करोड़ तक पहुंच जाएगी, यानी लगभग हर पांच में से एक नागरिक बुजुर्ग होगा।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के सामने एक अलग तरह की चुनौती है, क्योंकि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियां अक्सर 50 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते विकसित हो जाती हैं, जबकि पश्चिमी देशों में ये बीमारियां 60 साल के बाद दिखाई देती हैं।
पचास वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए देखभाल प्लेटफॉर्म ‘प्राण हेल्थ’ के संस्थापक और सीईओ नवनीत रामप्रसाद ने कहा कि बढ़ती उम्र को केवल अलग-अलग इलाज से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा, “50 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों के साथ काम करने के हमारे अनुभव से पता चला है कि लोगों के चलने-फिरने की क्षमता, ताकत और आत्मनिर्भरता बनाए रखने के लिए चिकित्सकों, फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञों और पुनर्वास विशेषज्ञों को मिलकर काम करना जरूरी है।
भारत में बुजुर्गों की संख्या बढ़ने के साथ ही बचाव और लगातार देखभाल उतनी ही महत्वपूर्ण होगी, जितना बीमारी का इलाज करना।”
रामप्रसाद ने कहा कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएं अब भी मुख्य रूप से बीमारी पर केंद्रित हैं, जहां बुजुर्ग अलग-अलग विशेषज्ञ चिकित्सकों से अलग-अलग सलाह लेते हैं।
उन्होंने कहा कि इस वजह से अक्सर चलने-फिरने की क्षमता, पोषण, पुनर्वास और दर्द नियंत्रण जैसी चीजों पर ध्यान नहीं दिया जाता।
रामप्रसाद ने कहा कि इससे अलग-अलग बीमारियों का इलाज होने के बावजूद कमजोरी बढ़ सकती है और व्यक्ति की आत्मनिर्भरता कम हो सकती है।
एम्स दिल्ली के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. नीरज निश्चल ने कहा कि सबसे बड़ी गलत धारणाओं में से एक यह है कि उम्र बढ़ने के साथ चलने-फिरने की क्षमता कम होना स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा, “कई बुजुर्गों में मांसपेशियों की ताकत, संतुलन और आत्मविश्वास कम हो जाता है, क्योंकि इन चीजों की जांच तब तक नहीं की जाती जब तक गिरने या हड्डी टूटने जैसी गंभीर समस्या न हो जाए। नियमित शारीरिक गतिविधि, विशेष रिहैबिलिटेशन और समय रहते कदम उठाने से कमजोरी को काफी समय तक टाला जा सकता है और बुजुर्ग लंबे समय तक आसानी से चल-फिर सकते हैं।”
एम्स दिल्ली के एनाटॉमी विभाग की प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा ने कहा कि उम्र बढ़ते हुए भी स्वस्थ के लिए बीमारियों के जोखिम को पहले ही नियंत्रित करना जरूरी है।
उन्होंने कहा, “बुजुर्गों में दिखाई देने वाली ज्यादातर हृदय संबंधी बीमारियों की शुरुआत कई दशक पहले हो जाती है। रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना, नियमित व्यायाम करना और पौष्टिक भोजन लेना न केवल जीवन को लंबा कर सकता है बल्कि जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर कर सकता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि रोजमर्रा की जिंदगी में योग को शामिल करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न केवल जीवनकाल बढ़ाने में मदद करता है बल्कि उम्र बढ़ने पर भी स्वास्थ्य बेहतर बनाए रख सकता है।
भाषा जोहेब संतोष
संतोष

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