जनजातीय मंत्रालय का पत्र वन अधिकार कानून की मूल भावना को कमजोर करने वाला: कांग्रेस

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जनजातीय मंत्रालय का पत्र वन अधिकार कानून की मूल भावना को कमजोर करने वाला: कांग्रेस

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  • Publish Date - September 8, 2026 / 03:30 PM IST,
    Updated On - September 8, 2026 / 03:30 PM IST

नयी दिल्ली, आठ सितंबर (भाषा) कांग्रेस ने वन अधिकार कानून (एफआरए), 2006 के क्रियान्वयन से संबंधित जनजातीय कार्य मंत्रालय के एक आधिकारिक पत्र का हवाला देते हुए मंगलवार को आरोप लगाया कि मंत्रालय का यह रुख इस कानून की मूल भावना को कमजोर करने वाला है।

पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने एक बयान में कहा कि 31 अगस्त, 2026 को जनजातीय कार्य मंत्रालय ने एक पत्र के माध्यम से ऊर्जा मंत्रालय को सूचित किया कि वन से इतर उद्देश्यों के लिए वन भूमि के उपयोग से जुड़ी परियोजनाओं के लिए ग्राम सभा की सहमति की कोई अनिवार्य व्यवस्था वन अधिकार कानून, 2006 में नहीं है और इसलिए ऐसे मामले उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।

उन्होंने इस आधिकारिक पत्र की एक प्रति भी साझा की।

उन्होंने मंत्रालय के इस रुख को ‘‘चौंकाने वाला’’ बताया और कहा कि यह कानून की गंभीर गलत व्याख्या और मंत्रालय की वैधानिक जिम्मेदारी से पीछे हटने को दर्शाता है।

कांग्रेस नेता ने सवाल किया कि क्या मंत्रालय ‘‘अदाणी समूह’’ और अन्य खनन कंपनियों के दबाव’’ में है?

रमेश ने कहा कि जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 12 जुलाई, 2012 को राज्य सरकारों को भेजे एक पत्र में स्पष्ट किया था कि वन भूमि के गैर-वानिकी इस्तेमाल और वनवासी समुदायों के पुनर्वास से पहले वन अधिकार कानून की धारा चार का अनुपालन किस तरह किया जाना है।

उन्होंने कहा कि 12 जनवरी, 2018 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के साथ हुई बैठक में भी जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने वन भूमि के उपयोग की मंजूरी की प्रक्रिया के पहले चरण में एफआरए के अनुपालन की अनिवार्यता को कमजोर करने के प्रस्ताव पर स्पष्ट आपत्ति जताई थी।

उन्होंने कहा कि इसके बाद 28 दिसंबर, 2018 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संसद में स्पष्ट किया था कि वन अधिकार कानून, 2006 के तहत अधिकारों की पहचान और उनका निपटारा तथा वन भूमि के उपयोग के प्रस्तावों के लिए ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है।

रमेश के अनुसार, यही स्थिति वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 में भी परिलक्षित होती है।

उन्होंने नियम 11(7) का हवाला देते हुए कहा कि वन भूमि के उपयोग की अनुमति देने वाला आदेश जारी किए जाने से पहले एफआरए का अनुपालन और उसके तहत अधिकारों का निपटारा जरूरी है।

पूर्व पर्यावरण मंत्री ने वन अधिकार कानून की धारा पांच का उल्लेख करते हुए कहा कि यह ग्राम सभा को कानून की धारा तीन के तहत मान्यता प्राप्त वनवासी समुदायों के अधिकारों और संसाधनों की रक्षा करने का अधिकार देती है।

उन्होंने कहा कि वन अधिकार कानून, 2006 के तहत जनजातीय मामलों के मंत्रालय को इस कानून के क्रियान्वयन के लिए नोडल मंत्रालय बनाया गया है और इसलिए उसके तहत दिए गए अधिकारों की रक्षा करना भी उसकी जिम्मेदारी है।

रमेश ने कहा, ‘‘जब आदिवासी और वनवासी समुदायों के अधिकार दांव पर हों और उन्हें वास्तविक खतरा हो, तब जनजातीय कार्य मंत्रालय वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन से दूरी नहीं बना सकता। ऐसा करना न केवल कानून की मूल भावना को कमजोर करेगा, बल्कि कानून और उन समुदायों का मजाक बनाने के समान होगा, जिनकी रक्षा के लिए यह कानून बनाया गया था।’’

भाषा हक हक नरेश

नरेश