नयी दिल्ली, तीन अप्रैल (भाषा) भरतनाट्यम नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरणी ने जब दिल्ली के बीचोंबीच भारत का सबसे सुंदर कला केंद्र खोलने के अपने सपने को साकार करने के लिए जानेमाने वास्तुकार जोसफ एलेन स्टीन को काम सौंपा था तो उनकी बस एक ही शर्त थी कि उसमें सूरज की रोशनी छनकर आनी चाहिए।
ये आजाद भारत के शुरुआती दिन थे। जैसे-जैसे नया भारत आगे बढ़ा, वैसे ही त्रिवेणी कला संगम भी आगे बढ़ा। यह बहुआयामी केंद्र इस साल 75 वर्ष का हो गया है और यह वास्तुकला, सौंदर्य और अलग-अलग कलाओं के मेलजोल की एक ऐसी जगह है जहां रोशनी हर तरफ से आती है।
त्रिवेणी कला संगम – यह नाम बांसुरी वादक विजय राघव राव ने दिया था, जिसका सीधा मतलब है ‘कलाओं का संगम’ यानी अपनी रोशन कक्षाओं, खुली गैलरी, हरे-भरे आंगन और एक ऐसी सोच के साथ श्रीधरणी के सपने का जीता-जागता सबूत, जो न सिर्फ़ अलग-अलग विचारों और कलाओं के मेल को बढ़ावा देती है, बल्कि उसे जरूरी भी बनाती है।
चित्रकार एम.एफ. हुसैन, तैयब मेहता और कृष्ण खन्ना; कलाकार यामिनी कृष्णमूर्ति, रवि शंकर और हरिप्रसाद चौरसिया; अभिनेता ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह और रोहिणी हट्टंगड़ी… ये तो बस कुछ ही नाम हैं जो दिल्ली के मंडी हाउस में स्थित इस सेंटर के जालीदार गलियारों से गुज़रे हैं।
त्रिवेणी कला संगम वह जगह भी है जहां अलग-अलग पीढ़ियों के कार्यकर्ता किसी मुहिम पर चर्चा करने या नुक्कड़ नाटक की रिहर्सल करने के लिए इकट्ठा होते हैं; जहां दोस्त कॉफ़ी पर मिलते हैं; जहां कला के पारखी कोई प्रदर्शनी देखने आते हैं; और जहां संगीत प्रेमी किसी कॉन्सर्ट के लिए ऑडिटोरियम में जमा होते हैं।
इसकी शुरुआत 1950 में कनॉट प्लेस के दो कमरों से हुई थी। तब से अब तक की इसकी कहानी दृढ़संकल्प, नवाचार, कलात्मक आज़ादी और वास्तुकला में नए प्रयोगों की है।
त्रिवेणी कला संगम के महासचिव अमर श्रीधरणी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मेरी मां बहुत ही ज़िद्दी महिला थीं; वह कभी हार नहीं मानती थीं।’’
सुंदरी को यह विचार तब आया, जब वह अल्मोड़ा में उदय शंकर से कला का प्रशिक्षण ले रही थीं। इस विचार ने तब असली रूप लेना शुरू किया, जब 1950 के दशक में दिल्ली के मुख्य आयुक्त शंकर प्रसाद, सुंदरी और उनके पति – मशहूर कवि कृष्णलाल श्रीधरणी से मिलने आए और कहा कि ‘‘सुंदरी जैसी महिला को कला संस्थान बनाने के लिए सरकार से ज़मीन मिलनी चाहिए।’’
अमर श्रीधरणी ने कहा, ‘‘उन्होंने मेरे पिता को वापस आयुक्त के पास भेजा। और उन्होंने कहा, ‘मैडम, मैं यह बात अपने हर भाषण में कहता हूं।’ लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने मेरे पिता पर मंत्री को चिट्ठियां लिखने का दबाव डाला। और आखिरकार, उन्हें यह जमीन मिल गई।’’
सुंदरी, स्टीन के पास गईं, जो उस समय सरकार की परियोजनाओं पर काम कर रहे थे। उन्होंने वास्तुकार को 10,000 रुपये देने के साथ-साथ यह आजादी भी दी कि वह इसे “जैसा चाहें, वैसा बना सकते हैं।”
श्रीधरणी ने कहा, ‘‘“एक ही शर्त थी कि अंदर सूरज की रोशनी आनी चाहिए; कम पेंटिंग हों। बाहर की तरफ़ ऐसा कुछ भी नहीं होना चाहिए, जिस पर पेंट करने की ज़रूरत पड़े।’’
इस सफ़र के दौरान, तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन और उपराष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन ने सुंदरी की मदद के लिए अपनी एक महीने की पगार दी, ताकि वे निर्माण का खर्च उठा सकें। दिग्गज सितारवादक रवि शंकर जैसे दूसरे शुभचिंतकों ने भी मदद की; वहीं, अमेरिकी दूतावास ने सुंदरी के निज़ामुद्दीन स्थित निर्माणाधीन घर को 10 साल के लिए किराए पर लेकर मदद की।
त्रिवेणी कला संगम में अभी अलग-अलग भारतीय शास्त्रीय कलाओं की कक्षाएं चलती हैं, जिनमें भरतनाट्यम, कथक और छऊ, बांसुरी, तबला, ढोलक, सितार, हिंदुस्तानी गायन, थिएटर, और ड्राइंग, पेंटिंग और मूर्तिकला जैसी ललित कलाएं शामिल हैं।
भाषा वैभव माधव
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