उप्र : अदालत ने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पुलिस के नजरिये पर नाखुशी जताई

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उप्र : अदालत ने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पुलिस के नजरिये पर नाखुशी जताई

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  • Publish Date - May 9, 2026 / 11:17 PM IST,
    Updated On - May 9, 2026 / 11:17 PM IST

प्रयागराज, नौ मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पुलिस के नजरिये पर नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि ना केवल हत्यारों को न्याय के कठघरे में लाना बल्कि मानव जीवन को बचाना सरकार की प्राथमिक चिंता होनी आवश्यक है।

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने बदायूं के निवासी ननकाराम नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि कानून व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों की मानव जीवन की रक्षा करने की संवेदनशीलता हमेशा से कम रही है और यह कमी अब भी बनी हुई है।

अदालत ने बदायूं की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) द्वारा दाखिल जवाब पर उनकी खिंचाई की।

इससे पहले याचिकाकर्ता ने सुरक्षा प्रदान करने का अनुरोध करते हुए एसएसपी से संपर्क किया था क्योंकि एक पारिवारिक जमीनी विवाद को लेकर उसे पांच लोगों से जान को गंभीर खतरा था।

पुलिस से हालांकि उदासीन जवाब मिलने के बाद शिकायतकर्ता ने उच्च न्यायालय का रुख किया।

अदालत ने याचिका पर सुनवाई करते हुए छह अप्रैल को बदायूं एसएसपी से व्यक्तिगत हलफनामा तलब किया था और पूछा था कि याचिकाकर्ता को खतरे का मूल्यांकन करने के लिए क्या कदम उठाए गए।

पीठ ने चार मई को जब हलफनामे पर गौर किया तो उसमें टाल मटोल का रवैया पाया क्योंकि हलफनामा में दो पक्षों के बीच विवाद कैसे उपजा और पुलिस ने दोनों पक्षों के खिलाफ ऐतिहाती क्या कदम उठाए हैं, इसकी जानकारी दी गई थी।

अदालत ने यह भी पाया कि विवाद को समझने का जिम्मा संभवतः किसी दरोगा (उपनिरीक्षक) की बुद्धिमत्ता पर सौंपा गया।

बदायूं की एसएसपी अंकिता शर्मा द्वारा दाखिल हलफनामे में यह भी उल्लेख किया गया कि आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई, आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया गया है और बीट आरक्षी को उस गांव में गश्त करने का निर्देश दिया गया।

हलफनामे में यह निष्कर्ष पेश किया गया कि गांव में शांति व्यवस्था कायम है और मुख्य मुद्दा दो पक्षों के बीच महज जमीन के एक टुकड़े और पारिवारिक रंजिश का है।

अदालत ने इन दलीलों पर आपत्ति जताते हुए इसे जीवन के खतरे के दावे को लेकर एक अपर्याप्त जवाब माना।

अदालत ने कहा, “अपराध होना एक बात है और शांति कायम रखना दूसरी बात। लेकिन याचिकाकर्ता द्वारा उसके जीवन को खतरे की आशंका बिल्कुल अलग बात है। हम पाते हैं कि जहां तक याचिकाकर्ता द्वारा जताई गई खतरे की धारणा का संबंध है, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा एक उदासीन रुख अपनाया गया।”

अदालत ने कहा कि अगर कल याचिकाकर्ता को गोली मार दी जाती है या उस पर हमला किया जाता है तो बीएनएसएस की धाराओं के तहत सुरक्षा की कार्यवाही उसका जीवन वापस नहीं लाएगी।

पीठ ने इलाज से बेहतर रोकथाम पर जोर देते हुए कहा कि इस मामले में इलाज कुछ और नहीं, बल्कि संभावित हत्यारों या हमलावरों के खिलाफ प्रतिशोधात्मक मुकदमा चलाना है।

अदालत ने कहा, “अपराधियों को सजा देना बिल्कुल अलग चीज है और इससे एक मानव जीवन की रक्षा नहीं होती। यह केवल भावी अपराधों को रोकने का काम करता है। हालांकि अनुभव से पता चलता है कि इससे अपराध शायद ही रुकता हो।”

अदालत नेएसएसपी बदायूं के जवाब को अपेक्षा से कहीं अधिक कम स्तर का बताते हुए उन्हें एक अन्य हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा कि याचिकाकर्ता को किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना से बचाने के लिए उनके पास सुरक्षा के क्या उपाय हैं।

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तिथि 13 मई निर्धारित की। भाषा सं राजेंद्र जितेंद्र

जितेंद्र