स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति सिर्फ नौकरी छोड़ने की क्रिया नहीं, बल्कि कर्मचारी का विशिष्ट अधिकार: न्यायालय

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स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति सिर्फ नौकरी छोड़ने की क्रिया नहीं, बल्कि कर्मचारी का विशिष्ट अधिकार: न्यायालय

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  • Publish Date - April 7, 2026 / 09:44 PM IST,
    Updated On - April 7, 2026 / 09:44 PM IST

नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति नौकरी छोड़ने या काम बंद करने की क्रिया नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी का विशिष्ट अधिकार है जो निर्धारित वर्षों की सेवा पूरी होने के बाद प्राप्त होता है।

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के 2019 के दो अलग-अलग आदेशों को चुनौती देने वाली अपीलों पर अपना फैसला सुनाया। एक बैंक ने यह अपील दायर की थीं

उच्च न्यायालय ने एक बैंक कर्मचारी को सेवानिवृत्ति लाभ प्रदान करने का निर्देश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के नोटिस में निर्दिष्ट तीन महीने की नोटिस अवधि पूरी होने के बाद या काम पर आना बंद करने की तारीख से, उसे स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त माना जाए।

उच्चतम न्यायालय ने गौर किया कि कर्मचारी की नियुक्ति सितंबर 1983 में हुई थी और अप्रैल 2007 में उसे प्रबंधक के पद पर पदोन्नत किया गया।

न्यायालय ने कहा कि जुलाई 2010 में, रायपुर शाखा प्रबंधक के रूप में काम करते समय, दो खातों में कुछ संदिग्ध लेनदेन बैंक के संज्ञान में आए। इस बीच, बैंक कर्मचारी ने 4 अक्टूबर, 2010 को महाप्रबंधक को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का नोटिस भेजा और इसके जवाब में, क्षेत्रीय कार्यालय ने पेंशन नियमों के तहत नया आवेदन मांगा।

बाद में, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए नोटिस में निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के कारण, कर्मचारी ने 16 मई, 2011 से बैंक में काम करना बंद कर दिया।

उच्चतम न्यायालय ने गौर किया कि बैंक से नौकरी छोड़ने के लगभग आठ महीने बाद, कथित संदिग्ध लेन-देन के संबंध में 5 मार्च, 2012 को उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया।

बाद में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को अस्वीकार किए जाने और शुरू की गई जांच और बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में अपील की। अपीलों पर सुनवाई करते हुए, पीठ ने पेंशन और सेवा नियमों के प्रासंगिक प्रावधानों का उल्लेख किया।

पीठ ने कहा, ‘‘… यह स्पष्ट है कि यदि कोई कर्मचारी 1 नवंबर 1993 को या उसके बाद 20 वर्ष की अर्हक सेवा पूरी कर लेता है और नियुक्ति प्राधिकारी को कम से कम तीन महीने का नोटिस देता है, तो वह स्वेच्छा से सेवानिवृत्त हो सकता है।”

पीठ ने कहा कि स्वेच्छा से सेवानिवृत्त होने की मंशा दर्शाने वाला तीन महीने का नोटिस 4 अक्टूबर 2010 को दिया गया था और यह अवधि 4 जनवरी 2011 को समाप्त होनी थी, लेकिन नोटिस अवधि के भीतर इसे अस्वीकार करने का आदेश नहीं दिया गया।

उसने कहा कि नोटिस अवधि समाप्त होने और काम बंद किए जाने के बाद 29 जून 2011 को दी गई अस्वीकृति निरर्थक थी। पीठ ने टिप्पणी की कि बैंक द्वारा 11 नवंबर 2010 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, लेकिन इससे सेवा नियमों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने की मंशा का संकेत नहीं मिलता है।

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार, कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले सभी लाभों का हकदार होगा। पीठ ने बैंक को निर्देश दिया कि वह तीन महीने के भीतर ब्याज सहित सभी बकाया राशि का भुगतान करे।

भाषा अविनाश पवनेश

पवनेश