जब संवैधानिक अधिकार ही न दिए जाएं तो गणतंत्र दिवस का क्या अर्थ: वांगचुक की पत्नी

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जब संवैधानिक अधिकार ही न दिए जाएं तो गणतंत्र दिवस का क्या अर्थ: वांगचुक की पत्नी

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  • Publish Date - January 27, 2026 / 05:19 PM IST,
    Updated On - January 27, 2026 / 05:19 PM IST

नयी दिल्ली, 27 जनवरी (भाषा) ‘हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव्स लद्दाख’ की सह-संस्थापक और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो ने कहा कि यह पहली बार था जब उन्हें गणतंत्र दिवस पर परेड देखने की इच्छा नहीं हुई।

सोमवार को 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर सैन्य शक्ति और सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया गया।

गीतांजलि ने कहा कि संविधान में निहित अधिकारों का हनन होते देख गणतंत्र दिवस का क्या अर्थ है?

उन्होंने सवाल किया कि वांगचुक की ‘गैरकानूनी’ गिरफ्तारी को चार महीने हो चुके हैं।

गीतांजलि ने कहा, “चार महीने! सोनम वांगचुक की गैरकानूनी और अवैध हिरासत के 120 दिन! मुझे याद है कि पहली बार मुझे टीवी पर गणतंत्र दिवस की परेड देखने की इच्छा नहीं हुई, जिसे मैं और मेरी मां हमेशा देखते थे।”

उन्होंने कहा, “यह दुखद है, लेकिन जो कुछ दिखाया जा रहा है उस पर गर्व करना मुझे समझ नहीं आ रहा। किस पर विश्वास करें और किस पर नहीं। भारत को विश्व के महान देशों में शामिल करने की इस कहानी में सच्चाई कहां है?”

मैग्सायसाय पुरस्कार विजेता जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद् वांगचुक को 26 सितंबर को कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था।

लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के दो दिन बाद वांगचुक को हिरासत में लिया गया था।

इन प्रदर्शनों में चार लोगों की मौत हो गई और 90 लोग घायल हो गए थे। अंगमो ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “जब संविधान में उपलब्ध सुरक्षा उपाय उस क्षेत्र को नहीं दिए जा रहे हैं जो वास्तव में इसके हकदार हैं, तो गणतंत्र दिवस कैसे मनाया जा सकता है? संविधान लोकतंत्र में अपना दृष्टिकोण रखने की गारंटी देता है। जब आप ऐसा करते हैं, तो आपको जेल भेज दिया जाता है।”

उन्होंने कहा,“करदाताओं का कितना पैसा दिखावे पर खर्च होता है? यह राष्ट्र के लिए है ताकि सभी अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सकें लेकिन इसकी नींव मजबूत होनी चाहिए। जब ​​नींव ही कमजोर हो तो दिखावे के आधार पर लोगों को प्रेरित नहीं किया जा सकता।”

अंगमो ने कहा, “यह एक तरह की निराशा” है।

भाषा जितेंद्र नरेश

नरेश