चेक बाउंस मामले में महिला की दोषसिद्धि बरकरार, मुकदमे के दौरान बार-बार बदलता रहा उसका रुख : अदालत

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चेक बाउंस मामले में महिला की दोषसिद्धि बरकरार, मुकदमे के दौरान बार-बार बदलता रहा उसका रुख : अदालत

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  • Publish Date - July 26, 2026 / 03:00 PM IST,
    Updated On - July 26, 2026 / 03:00 PM IST

नयी दिल्ली, 26 जुलाई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने चेक बाउंस मामले में एक महिला की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कहा कि मुकदमे के दौरान उसकी दलीलें ‘‘नदी की तरह बार-बार अपना रास्ता बदलती रहीं’’।

अदालत ने कहा कि महिला ने पहले चेक और उस पर किए गए हस्ताक्षर से इनकार किया, बाद में उसे सुरक्षा के तौर पर दिया गया चेक बताया और अंततः यह दावा किया कि उसने कर्ज की राशि पहले ही चुका दी थी।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह लालेर नवंबर 2024 में मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा परक्राम्य लिखत अधिनियम के तहत महिला को चेक बाउंस मामले में दोषी ठहराए जाने के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रहे थे।

इस मामले में सजा अगले महीने सुनायी गयी थी, जिसमें महिला को 90 दिनों के भीतर पांच लाख रुपये का मुआवजा अदा करने या ऐसा न करने पर तीन महीने के साधारण कारावास की सजा भुगतने का निर्देश दिया गया था।

आठ जुलाई के अपने आदेश में न्यायाधीश ने कहा, ‘‘सत्य के विपरीत, बचाव पक्ष का रुख हमेशा एक जैसा बना रहे, यह जरूरी नहीं है। यह पहले पूरी तरह इनकार से शुरू हो सकता है, फिर कुछ तथ्यों को स्वीकार करते हुए नया बचाव अपना सकता है और अंततः बिल्कुल अलग कहानी में बदल सकता है।’’

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मुकदमे के प्रत्येक नए चरण के साथ इसका स्वरूप ठीक उसी तरह बदल सकता है, जैसे कोई नदी अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं के अनुसार अपना मार्ग बदल लेती है। यह अपील ठीक ऐसी ही स्थिति का उदाहरण है।’’

न्यायाधीश ने कहा कि अपीलकर्ता ओमवती टोकस ने अपने बचाव में तीन ऐसे अलग-अलग तर्क दिए, जो एक-दूसरे का ही खंडन करते थे। शुरुआत में उसने कहा कि संबंधित चेक उसका नहीं है और उस पर उसके हस्ताक्षर भी नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि चार वर्ष बाद जिरह के दौरान उसने दावा किया कि वह चेक उसके घर पर लकड़ी के कुछ काम के लिए ‘‘सिक्योरिटी’’ के तौर पर दिया गया था। इसके बाद अदालत में दिए गए अपने बयान में उसने यह स्वीकार किया कि चेक पर हस्ताक्षर उसके ही हैं, लेकिन साथ ही यह दावा किया कि उसने ऋण की राशि पहले ही किस्तों में चुका दी थी।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘पहले पूरी तरह इनकार, फिर आंशिक स्वीकारोक्ति के साथ यह कहना कि चेक ‘सिक्योरिटी’ के तौर पर दिया गया था और उसके बाद यह दलील कि कर्ज चुका दिया गया था- मुकदमे के तीन अलग-अलग चरणों में तीन अलग-अलग बचाव पेश किए गए, जिनमें से प्रत्येक पहले वाले का ही खंडन करता था।’’

यह मामला वर्ष 2011-12 का है, जब शिकायतकर्ता नरसी लाल ने ओमवती टोकस की पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे तीन लाख रुपये उधार दिए थे। पेशे से बढ़ई नरसी लाल ने अदालत को बताया कि यह राशि जुटाने के लिए उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा के उद्देश्य से खरीदा गया एक भूखंड बेच दिया था।

जब टोकस ने अप्रैल 2016 में यह राशि लौटाने के लिए तीन लाख रुपये का चेक जारी किया तो बैंक ने उसे ‘‘पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं होने’’ के कारण ‘बाउंस’ कर दिया।

मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा पांच लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश को बरकरार रखते हुए न्यायाधीश ने कहा कि टोकस द्वारा बार-बार बदलते और नए-नए बचाव पेश किए जाने के कारण मुकदमा आठ वर्ष से अधिक समय तक चलता रहा।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘तीन लाख रुपये की मूल राशि पर इस अवधि के दौरान सामान्य ब्याज भी जोड़ दिया जाए तो मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा दिया गया पांच लाख रुपये का मुआवजा किसी भी दृष्टि से न तो अत्यधिक है और न ही असंगत।’’

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यदि यह मान भी लिया जाए कि अपीलकर्ता पहले ही 48 दिन जेल में रह चुकी है, तो इसका प्रभाव अधिकतम इतना ही हो सकता है कि मुआवजे की राशि का भुगतान न करने की स्थिति में निर्धारित सजा के क्रियान्वयन के समय इसे ध्यान में रखा जाए।’’

भाषा गोला रंजन

रंजन