आमेर महल की ऐतिहासिक भित्ति चित्रकारी को संरक्षित करने में पहली बार आधुनिक तकनीक का उपयोग हो रहा

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आमेर महल की ऐतिहासिक भित्ति चित्रकारी को संरक्षित करने में पहली बार आधुनिक तकनीक का उपयोग हो रहा

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  • Publish Date - July 26, 2026 / 03:38 PM IST,
    Updated On - July 26, 2026 / 03:38 PM IST

(अविनाश बाकोलिया)

जयपुर, 26 जुलाई (भाषा) विश्व धरोहर आमेर महल की 16वीं से 18वीं शताब्दी की ऐतिहासिक भित्ति चित्रकारी (वॉल पेंटिंग्स) को संरक्षित करने के लिए पहली बार अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। संरक्षण परियोजना से जुड़े अधिकारी कीर्तिपाल सिंह परमार ने कहा कि इसके लिए एक्स-रे फ्लोरेसेंस (एक्सआरएफ),अल्ट्रावॉयलेट फोटोग्राफी, मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग और इन्फ्रारेड जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

परमार ने कहा कि भारत सरकार का इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) का संरक्षण प्रभाग आमेर विकास एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एडीएमए) और पुरातत्व विभाग के सहयोग से आमेर महल के भित्ति चित्रों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और संरक्षण कर रहा है।

उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य चित्रों की मौजूदा स्थिति, उनमें प्रयुक्त मूल रंगों और सामग्री की पहचान कर वैज्ञानिक आधार पर संरक्षण करना है, ताकि उनकी ऐतिहासिक मौलिकता और प्रामाणिकता बरकरार रह सके। इस परियोजना के लिए 2.32 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।

आईजीएनसीए की विशेषज्ञ टीम भित्ति चित्रों के संरक्षण से पहले उनका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण कर रही है।

परियोजना प्रबंधक के रूप में कार्यरत परमार ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि प्रदेश में पहली बार राजस्थान पुरातत्व विभाग के किसी महल में करीब एक करोड़ रुपये मूल्य की अत्याधुनिक एक्स-रे फ्लोरोसेंस (एक्सआरएफ) मशीन के जरिए भित्ति चित्रों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा रहा है।

एक्स-रे फ्लोरेसेंस तकनीक की खासियत यह है कि बिना किसी प्रकार की छेड़छाड़ या नुकसान पहुंचाए, किसी प्रकार का नमूना लिए बिना ही भित्ति चित्रों की सतह पर उपकरण रखकर उनमें प्रयुक्त प्राकृतिक रंगों, उनकी रासायनिक संरचना और सतह की स्थिति का सटीक पता लगाया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि इसके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि सफाई और संरक्षण के दौरान किन रसायनों का उपयोग सुरक्षित रहेगा तथा किन पदार्थों से बचना चाहिए।

इससे संरक्षण कार्य पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर होगा और सदियों पुराने मूल रंगों व कलाकृतियों को सुरक्षित रखने में बड़ी मदद मिलेगी।

परमार ने कहा, ‘‘इसके अलावा अल्ट्रावॉयलेट फोटोग्राफी के जरिए यह भी पता लगाया जा रहा है कि किन भित्ति चित्रों पर पहले कभी ‘री-टचिंग’ या रंगाई की गई थी। यदि बाद में चढ़ाई गई रंगों की परतें मिलती हैं, तो उनका अध्ययन कर आवश्यकता पड़ने पर उन्हें हटाया जाएगा और मूल चित्र के अनुरूप ही संरक्षण किया जाएगा।”

उन्होंने कहा, ‘‘आमेर महल की ये भित्ति चित्रकारी सदियों से धूप, बारिश, नमी, तापमान में बदलाव जैसे प्राकृतिक कारकों का सामना कर रही है। खुले वातावरण में होने के कारण कई स्थानों पर रंग फीके पड़ गए हैं, सतह क्षतिग्रस्त हुई है और कुछ हिस्सों में लोगों द्वारा खुरचने जैसी गतिविधियों से भी नुकसान पहुंचा है। इसी वजह से संरक्षण कार्य शुरू करने से पहले इन चित्रों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है।”

परमार ने बताया कि फिलहाल इस कार्य की शुरुआत आमेर महल की भोजनशाला से की गई है। इसके बाद सिंहपोल, गणेशपोल और मान सिंह महल की भित्ति चित्रकारी का पता लगाया जाएगा।

विशेषज्ञों ने भोजनशाला और गणेशपोल में मल्टी स्पेक्ट्रम इमेजिंग तकनीक के माध्यम से चित्रों की विस्तृत डिजिटल मैपिंग और छिपी हुई परतों का अध्ययन किया।

वैज्ञानिक विश्लेषण पूरा होने के बाद विस्तृत संरक्षण दिशानिर्देश तैयार किए जाएंगे और उसी के आधार पर सफाई, संरक्षण तथा ‘री-टचिंग’ का कार्य किया जाएगा।

अधिकारी ने बताया कि किसी भी भित्ति चित्र की सफाई शुरू करने से पहले विभिन्न स्थानों पर चार गुणा चार इंच के परीक्षण नमूने तैयार किए जा रहे हैं। इन परीक्षणों के माध्यम से यह तय किया जा रहा है कि किस प्रकार के रसायनों से सतह की सुरक्षित सफाई की जा सकती है, ताकि मूल चित्रों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे।

उन्होंने बताया कि आमेर महल के विभिन्न हिस्सों में चित्रांकन शैली और सतह अलग-अलग प्रकार की है। सबसे पुराने हिस्सों में 16वीं शताब्दी की अपेक्षाकृत साधारण टेराकोटा रंगों वाली चित्रकारी है, जबकि गणेशपोल सहित अन्य हिस्सों में आराइश (चूने के चिकने पलस्तर) पर उत्कृष्ट भित्ति चित्र बनाए गए हैं। सफाई के बाद ही इन चित्रों के वास्तविक रंग और मूल स्वरूप पूरी तरह सामने आ सकेंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान में आज भी कुछ पारंपरिक लघु चित्र कलाकार प्राकृतिक रंग तैयार करते हैं। इन कलाकारों द्वारा तैयार किए गए प्राकृतिक रंग की तुलना प्राचीन भित्ति चित्रों के मूल रंगों से की जा रही है। यदि दोनों में समानता पायी जाती है, तो संरक्षण कार्य में उन्हीं रंगों का उपयोग किया जाएगा।

आमेर महल के अधीक्षक राकेश छोलक ने बताया कि पहली बार आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से कार्य किया जा रहा है।

भाषा बाकोलिया संतोष

संतोष

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