Reverse Aging Clinical Trial : क्या अब इंसान बूढ़ा होना बंद कर देगा? वैज्ञानिकों ने शुरू किया दुनिया का पहला Anti-Aging Human Trial

Ads

अमेरिका की लाइफ बायोसाइंसेज कंपनी ने 'ER-100' जीन थेरेपी का पहला मानव परीक्षण शुरू कर दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह तकनीक कोशिकाओं को फिर से युवा और सक्रिय बनाने में मदद कर सकती है।

  •  
  • Publish Date - June 12, 2026 / 05:33 PM IST,
    Updated On - June 12, 2026 / 05:39 PM IST

Reverse Aging Clinical Trial / Image Source : AI GENERATED

HIGHLIGHTS
  • दुनिया का पहला Anti-Aging Human Trial शुरू
  • ER-100 जीन थेरेपी का पहला डोज मरीज को दिया गया
  • उम्र से जुड़ी आंखों की बीमारियों वाले मरीजों पर परीक्षण

नई दिल्ली : Reverse Aging Clinical Trial :  मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कामयाबी मिली है। वैज्ञानिकों ने इंसानी उम्र के बढ़ते असर को रोकने और उसे वापस पलटने की दिशा में दुनिया का पहला इंसानी ट्रायल शुरू कर दिया है। अमेरिका की ‘लाइफ बायोसाइंसेज’ कंपनी ने ‘ER-100’ नाम की एक प्रयोगात्मक जीन थेरेपी का पहला डोज एक इंसानी मरीज को दे दिया है। कल तक जिसे सिर्फ साइंस फिक्शन माना जाता था, उसे अब हकीकत में बदलने की कोशिश की जा रही है।

इन लोगों पर किया जा रहा है प्रयोग

इस तकनीक का पहला परीक्षण उन मरीजों पर किया जा रहा है जो ग्लूकोमा और उम्र से जुड़ी बीमारियों के कारण अपनी आंखों की रोशनी खो रहे हैं। David Sinclair Information Theory Of Aging इस थेरेपी में मरीज की आंख में एक विशेष इंजेक्शन दिया जाता है, जो शरीर के भीतर जाकर खास जीनों को सक्रिय करता है। यह तकनीक हार्वर्ड के वैज्ञानिक डेविड सिंक्लेयर के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार कोशिकाएं बूढ़ी होने पर काम करने का तरीका भूल जाती हैं। यह दवा उन कोशिकाओं को बिना नुकसान पहुंचाए फिर से युवा और एक्टिव बना देती है। इससे पहले चूहों और बंदरों पर इसके सफल परीक्षण किए जा चुके हैं, जहां जीवों की आंखों की रोशनी वापस लौट आई थी।

कड़ी निगरानी में रहेंगे मरीज

क्यूंकि कोशिकाओं को दोबारा युवा बनाना चिकित्सा जगत में बेहद जोखिम भरा माना जाता है, इसलिए वैज्ञानिक आने वाले कई महीनों तक इन मरीजों की कड़ी निगरानी करेंगे। Reverse Aging Clinical Trial इस परीक्षण के लिए आंख को इसलिए चुना गया है क्योंकि यहां दवा के असर और साइड इफेक्ट्स को ट्रैक करना आसान होता है। अगर यह क्लीनिकल ट्रायल पूरी तरह सुरक्षित और सफल रहता है, तो भविष्य में न सिर्फ अंधापन दूर किया जा सकेगा, बल्कि इंसानी शरीर को लंबे समय तक युवा रखने का रास्ता भी खुल जाएगा।

इन्हें भी पढ़ें :