( लेमुएल लाल )
भोपाल, 10 अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश में पिछले साल जनवरी के बाद 14 महीनों में कुल 149 तेंदुओं की मौत हुई है।
सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में यह जानकारी सामने आई है, जिसमें यह भी बताया गया है कि दुर्घटनाओं में सबसे अधिक तेंदुओं की मौतें हुई हैं।
आरटीआई आवेदन दायर करने वाले कार्यकर्ता अजय दुबे ने कहा कि आंकड़े एक गंभीर वास्तविकता को दर्शाते हैं जबकि वन विभाग ने कहा कि मौतों को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
वन विभाग ने यह भी कहा कि चार प्रतिशत की मृत्यु दर ‘बड़ी बिल्लियों’ के लिए स्वीकृत सीमा के भीतर है।
फरवरी 2024 में जारी भारत में तेंदुओं की स्थिति 2022‘ रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश में तेंदुओं की संख्या देश में सबसे अधिक 3,907 है। इसके बाद महाराष्ट्र और कर्नाटक का स्थान है। राज्य में 2018 में 3,421 तेंदुओं के होने की सूचना थी।
आरटीआई जवाब में विभाग ने कहा कि जनवरी 2025 से शुरू होने वाले 14 महीनों में मध्यप्रदेश में 149 तेंदुओं की मौत हुई।
विभाग के मुताबिक इनमें से 31 प्रतिशत मौतें सड़क दुर्घटनाओं के कारण हुईं और इनमें भी 19 प्रतिश मौतें राजमार्गों पर हुईं।
आरटीआई जवाब के अनुसार 24 प्रतिशत मौतें उम्र और बीमारी जैसे प्राकृतिक कारणों से हुई, जबकि 21 प्रतिशत वन्यजीवों के बीच संघर्ष के कारण हुई।
जवाब में विभाग ने यह जानकारी भी दी कि लगभग 14 प्रतिशत मौतों के लिए अवैध शिकार और प्रतिशोधी हत्याएं जिम्मेदार थीं। आठ जानवरों को जानबूझकर या गलती से बिजली का झटका लगा था, जबकि दो को जाल में फंसने के कारण मौत हुर्ठ।
विभाग ने बताया कि करीब नौ फीसदी मामलों में मौत के कारणों का पता नहीं चल सका है।
अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एल कृष्णमूर्ति ने कहा कि राज्य में तेंदुए की मृत्यु दर को कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
कृष्णमूर्ति ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘तेंदुए छोटे और फुर्तीले होते हैं , इसलिए हम एक रोडमैप के साथ मृत्यु दर को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।’’
उन्होंने कहा कि तेंदुए अक्सर बड़े क्षेत्रों में मानव आवासों के करीब पाए जाते हैं।
वन अधिकारी ने कहा कि मौतों को कम करने के लिए नई सड़कों पर जानवरों के मार्ग, साइनेज और नियमित गश्त जैसे उपायों को लागू किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘हम सड़कों के पास जल स्रोत बनाने के खिलाफ भी सलाह दे रहे हैं, क्योंकि जानवर अक्सर उनकी ओर बढ़ते हैं और दुर्घटनाओं की चपेट में आ जाते हैं।’’
एक अन्य वरिष्ठ वन अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि मध्यप्रदेश में लगभग 4,000 में से 149 तेंदुओं की मौत केवल चार प्रतिशत का नुकसान है।
उन्होंने कहा, ‘‘हम उम्मीद करते हैं कि बड़ी बिल्ली परिवार के सदस्य तेंदुओं में 12 महीने के भीतर न्यूनतम 10 प्रतिशत मृत्यु दर होगी।’’
उन्होंने कहा कि यहां तक कि 20 प्रतिशत तक का वार्षिक नुकसान भी स्वीकार्य है, क्योंकि उम्र संबंधी कई कारणों से भी तेंदुए मर जाते हैं।
कार्यकर्ता दुबे ने कहा कि मध्यप्रदेश में तेंदुए की रिकॉर्ड मौत एक गंभीर वास्तविकता को उजागर करती है।
उन्होंने कहा, ‘‘टाइगर स्टेट (मध्यप्रदेश) तेंदुओं के लिए कब्रिस्तान बन गया है।’’
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) प्रोटोकॉल को लागू करने में व्यवस्थित विफलता और सुरक्षित गलियारों की कमी उन्हें खत्म कर रही है।
उन्होंने कहा कि दुर्घटनाओं में सबसे अधिक मौतें होती हैं, लेकिन रैखिक बुनियादी ढांचे या बिजली के झटके से होने वाली मौतों पर कोई जवाबदेही नहीं है।
उन्होंने दावा किया कि एनटीसीए और वन विभाग की उदासीनता साबित करती है कि तेंदुए अब प्राथमिकता में नहीं हैं।
भाषा ब्रजेन्द्र
मनीषा धीरज
धीरज