shahar kazi/ image source: ibc24
Dhar Bhojshala Verdict: धार: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच द्वारा धार स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर पर ऐतिहासिक फैसला सुनाए जाने के बाद पूरे शहर में जश्न का माहौल देखने को मिला। अदालत ने भोजशाला को मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना की अनुमति दे दी है। फैसले के बाद भोज उत्सव समिति के सदस्य, आंदोलनकारी और बड़ी संख्या में श्रद्धालु अखंड ज्योति मंदिर पहुंचे, जहां मां वाग्देवी और भगवान श्रीराम के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने इसे सनातन आस्था और वर्षों से चल रहे आंदोलन की बड़ी जीत बताया। वहीं, किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए भोजशाला परिसर और आसपास के इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ASI सर्वे रिपोर्ट को अहम आधार माना। सर्वे के दौरान परिसर से कई खंडित देवी-देवताओं की मूर्तियां मिली थीं, जबकि दीवारों पर धार्मिक आकृतियां और राजा भोज काल की नक्काशी भी सामने आई थी। ASI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मस्जिद का निर्माण मंदिर के अवशेषों और खंभों का पुनः उपयोग कर किया गया था। अदालत ने केंद्र सरकार से लंदन म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्राचीन प्रतिमा को भारत वापस लाने पर भी विचार करने को कहा है, जिसके बाद प्रतिमा वापसी की मांग तेज हो गई है।
हालांकि, फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। शहर काजी ने ASI की रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताते हुए आरोप लगाया कि कई साक्ष्यों को नजरअंदाज किया गया और रिपोर्ट सिर्फ एक पक्ष को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार की गई। उन्होंने कहा कि 2003 का आदेश नमाज को जारी रखने के लिए था और यहां सदियों से नमाज होती आ रही है। काजी ने यह सवाल भी उठाया कि धारा 144 लागू होने के बावजूद हिंदू पक्ष द्वारा आतिशबाजी और नारेबाजी कैसे की गई। उन्होंने दावा किया कि 1935 के गजट नोटिफिकेशन और मराठा स्टेट के रिकॉर्ड में भी इसे मस्जिद बताया गया है। गौरतलब है कि भोजशाला विवाद 11वीं सदी में राजा भोज द्वारा निर्मित स्थल को लेकर है, जहां हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का मंदिर और संस्कृत विश्वविद्यालय मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।
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