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भोपाल: नमस्कार, फेस टू फेस मध्यप्रदेश में आप सभी का स्वागत है। कांग्रेस ने आज 4 विधानसभा के प्रत्याशियों के टिकट बदले है जिसमें सुमावली पिपरिया, बडनगर और जावरा है। यहां स्थानीय कार्यकर्ता ने ये दिखा दिया है कि विरोध में अगर दम है तो हाईकमान को भी अपना फैसला बदलना पड़ता है। वरना अजब सिंह कुशवाहा ने जो कुछ भी किया उसके बाद इनाम मिलना तो दूर की बात है। चुनाव न होता तो पार्टी में एंट्री तक न मिलती। पिपरिया से गुरुचरण के बाहरी होने की वजह से 12 स्थानीय दावेदार विरोध कर रहे थे..फिर पार्टी को बीच का रास्ता निकलना पड़ा। जावरा से टिकट न मिलने पर वीरेंद्र सिंह ने भोपाल में मोर्चा खोल रखा था फिर थक हार कर पार्टी को टिकट देना पड़ा ठीक ऐसे ही बड़नगर में मुरली मोरवाल ने जब निर्दलीय चुनाव लड़ने का एलान किया तो राजेंद्र सिंह सोलंकी की जगह विधायक मुरली मोरवाल को तवज्जो दी गई। अब राजेंद्र सिंह सोलंकी ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का एलान किया।
मध्यप्रदेश में टिकट कटने से नाराज़ दावेदारों का विरोध आखिरकार काम आया। कांग्रेस ने नाराज़ नेताओं के सामने सरेंडर कर दिया। फिलहाल कांग्रेस ने दूसरी दफा टिकटों में बदलाव किया है। इसके पहले कांग्रेस ने तीन सीट गोटेगांव, पिछोर और दतिया से टिकट बदला था और अब कांग्रेस ने सुमावली से कुलदीप सिकरवार की जगह मौजूदा विधायक अजब सिंह कुशवाहा,बड़नगर से राजेंद्र सोलंकी की जगह मौजूदा विधायक मुरली मोरवाल,पिपरिया में गुरु चरण खरे की जगह विरेंद्र बेलवंशी और जावरा से हिम्मत श्रीमल की जगह विरेंद्र सिंह सोलंकी को टिकट दिया है। टिकटों में फेरबदल के पीछे कांग्रेस कह रही है कि पार्टी को हर हाल में चुनाव जीतना है इसलिए फेरबदल कर जिताऊ उम्मीदवारों को मौका दिया गया है।
दरअसल सुमावली में कांग्रेस को सबसे तगड़ा विरोध देखने को मिला था। अजब सिंह कुशवाहा ने कुर्ता फाड़ते हुए कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। बसपा में शामिल हो गए थे और कांग्रेस को चुनौती तक दे डाली थी की कांग्रेस को मुरैना की 6 की 6 सीटों पर हार झेलनी पड़ेगी।
इसके बाद पार्टी ने रिव्यू किया। कहीं प्रत्याशी का विरोध भारी पड़ा। तो कहीं स्थानीय कार्यकर्ताओं का दबाव काम आया तो कहीं जातीगत समीकऱण को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस को टिकट बदलना ही पड़ा। टिकट बदलने को लेकर भले ही कांग्रेस फीडबैक का आधार बता रही हो लेकिन बीजेपी इसे कांग्रेस का डर बता रही है।
जाहिर है कांग्रेस हर हाल में सत्ता हासिल करना चाहती है। टिकट बदलना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। लेकिन ये तो तय है कि कांग्रेस का सर्वे एक बार फिर फेल रहा। अब सवाल ये है कि, क्या प्रेशर पॉलिटिक्स की वजह से कांग्रेस ने प्रत्याशी बदले हैं। क्या प्रत्याशी बदलने से कांग्रेस अबतक हुए डैमेज से उबर पाएगी। जिनके नाम वापस लिए गए उनसे निपटने के लिए कांग्रेस का क्या प्लान होगा और क्या कांग्रेस के बार-बार प्रत्याशी बदलने से बीजेपी को फायदा होगा ?