High Court on Love Marriage: वकील ने कराई आर्य समाज में शादी.. फिर सुरक्षा दिलाने के नाम पर ऐंठे इतने हजार रुपए, हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला तो कर दी ये सख्त टिप्पणी

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वकील ने कराई आर्य समाज में शादी.. फिर सुरक्षा दिलाने के नाम पर ऐंठे इतने हजार रुपए, MP High Court on Love Marriage:

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  • Publish Date - June 30, 2026 / 10:54 PM IST,
    Updated On - June 30, 2026 / 10:54 PM IST

ग्वालियर। High Court on Love Marriage: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने प्रेम विवाह के बाद दायर होने वाली पुलिस सुरक्षा याचिकाओं पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि प्रेम विवाह के बाद सुरक्षा मांगना अब “आठवां फेरा” नहीं बन जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक प्रेम विवाह के बाद सुरक्षा याचिका दाखिल करने की प्रवृत्ति न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डाल रही है और इससे वास्तविक खतरे वाले मामलों की गंभीरता प्रभावित हो सकती है।

High Court on Love Marriage: मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया ने वकीलों को भी कड़ी नसीहत दी। अदालत ने कहा कि अधिवक्ता अपने कार्यालयों का उपयोग युवक-युवतियों के शोषण के लिए न करें और सुरक्षा याचिकाओं को केवल औपचारिक रस्म न बनाया जाए। कोर्ट ने कहा कि ऑनर किलिंग जैसे मामलों में वास्तव में खतरे का सामना कर रहे लोगों को तत्काल सुरक्षा मिलनी चाहिए, लेकिन हर मामले में एक जैसी याचिकाएं दायर होने से ऐसे गंभीर मामलों की प्राथमिकता प्रभावित होती है।

दरअसल, ग्वालियर के एक युवक-युवती ने आर्य समाज मंदिर में प्रेम विवाह किया था। इसके बाद युवती की मां ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान पुलिस नवविवाहित दंपती को अदालत के समक्ष पेश किया, जहां युवती ने कई अहम खुलासे किए। युवती ने अदालत को बताया कि अधिवक्ता आकाश गोयल ने शादी कराने और बाद में कोर्ट से पुलिस सुरक्षा दिलाने के नाम पर 40 हजार रुपये वसूले। आरोप है कि वही अधिवक्ता दोनों को आर्य समाज मंदिर ले गया, विवाह कराया और बाद में न्यायालय में दाखिल किए जाने वाले दस्तावेजों पर भी हस्ताक्षर कराए। हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने संकेत दिए कि ऐसे मामलों में जिम्मेदार लोगों की भूमिका की भी जांच आवश्यक है, ताकि भविष्य में न्यायालय की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल न हो।

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