‘उमराव जान’ के गीतों में प्रामाणिकता लाने के लिए लखनऊ संस्कृति में ढल गई थीं आशा: मुजफ्फर अली

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‘उमराव जान’ के गीतों में प्रामाणिकता लाने के लिए लखनऊ संस्कृति में ढल गई थीं आशा: मुजफ्फर अली

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  • Publish Date - April 13, 2026 / 04:43 PM IST,
    Updated On - April 13, 2026 / 04:43 PM IST

मुंबई, 13 अप्रैल (भाषा) फिल्मकार मुजफ्फर अली का कहना है कि आशा भोसले ने ‘उमराव जान’ में रेखा के किरदार की आवाज बनने के लिए लखनऊ की संस्कृति में खुद को पूरी तरह से ढाल लिया था, क्योंकि गायिका को हमेशा से पता था कि वह 1981 की इस हिट फिल्म में कुछ खास करने जा रही हैं।

अली ने बताया कि भोसले ने फिल्म में जो गजलें गाईं, उनके लिए उन्हें न सिर्फ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, बल्कि उन्हें अक्सर उनके आठ दशक लंबे करियर की सबसे अच्छी गजलों में गिना जाता है।

अली ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में बताया, ‘‘वह खय्याम साहब की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। उन्हें पता था कि वह कुछ ऐसा बना रही हैं जो हमेशा रहेगा। उन्हें इससे बहुत खुशी मिल रही थी।’’

भोसले का रविवार को मुंबई में निधन हो गया। वह 92 साल की थीं।

पुरानी यादों में खोते हुए, अली ने याद किया कि भोसले गानों में सच्चापन लाने के लिए बहुत ज़्यादा मेहनत करती थीं। उन्होंने कहा, ‘‘वह फिल्म में कुछ खास लाना चाहती थीं और असली दिखना चाहती थीं। वह उमराव जान बनना चाहती थीं, लखनऊ घूमना चाहती थीं, और लखनऊ की खासियत, ‘अदा’ और ‘तहज़ीब’ के बारे में जानना चाहती थीं।’’

फिल्मकार ने बताया, “उन्होंने इन सबका निचोड़ अपनी गायकी में उतारा।”

अली ने कहा कि भोसले ने ‘इन आंखों की मस्ती’, ‘दिल चीज़ क्या है’, ‘यह क्या जगह है दोस्तों’, ‘जुस्तुजू जिसकी थी’, ‘जब भी मिलती है’ जैसी मशहूर ग़ज़लों के लिए ज़रूरी भाव लाने के लिए उनके गाने की शैली में बदलाव किया। खय्याम ने इस फिल्म का संगीत तैयार किया और शहरयार ने गाने के बोल लिखे।

‘उमराव जान’ से पहले, भोसले का करियर ऊपर चढ़ रहा था। उन्होंने ‘अभी ना जाओ छोड़ कर’, ‘आओ हुज़ूर तुमको’, ‘उड़े जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी’, ‘दम मारो दम’, ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’, और भी कई हिट गाने गाए थे।

लेकिन ‘उमराव जान’ के गीत उनके करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुए।

अली ने बताया कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने के बाद वह भावुक थीं। उन्होंने स्पष्टता और शालीनता से यह माना कि मेरे उनके साथ काम करने की वजह से उन्हें यह पुरस्कार मिला। अली ने कहा, ‘‘उन्होंने मेरे लिए हाथ से एक प्यारा नोट लिखा था, जो मेरे पास अब भी है।’’

भाषा वैभव माधव

माधव