मुंबई, 16 जून (भाषा) फिल्म ‘लगान’ का संगीत तैयार करते समय संगीतकार ए.आर. रहमान का उद्देश्य ऐसी सुर रचना करना था जो समय की कसौटी पर खरी उतरे और लंबे समय तक लोगों के बीच रहे। वह मानते हैं कि यह फिल्म भारतीय फिल्म संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने में मील का एक महत्वपूर्ण पत्थर साबित हुई।
‘लगान’ की रिलीज के 25 वर्ष पूरे होने पर इस फिल्म के बारे में ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में रहमान ने सोमवार को कहा कि ‘लगान’ को मिले अंतरराष्ट्रीय सम्मान ने उन्हें कई विदेशी परियोजनाओं तक पहुंचने का अवसर दिया।
निर्देशक आशुतोष गोवारीकर के निर्देशन में बनी और आमिर खान अभिनीत इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में अकादमी पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। फिल्म के संगीत की भी व्यापक सराहना हुई थी।
रहमान ने कहा, ‘‘मेरी पहली फिल्म से ही मेरी इच्छा थी कि मेरा संगीत दुनिया भर में पहुंचे। ध्वनि निर्माण, गीत, प्रस्तुति, श्रेय और मास्टरिंग पर हमने इसलिए विशेष मेहनत की ताकि यह भविष्य में भी प्रासंगिक बना रहे। मैं चाहता था कि भारतीय संगीत ऐसा हो जिसे पूरी दुनिया पसंद करे।’’
उन्होंने कहा कि ‘लगान’ की सफलता के बाद उन्हें चीनी फिल्म ‘वारियर्स ऑफ हैवेन एंड अर्थ’ और अंतरराष्ट्रीय परियोजना ‘एलिजबेथ : द गोल्डन एज’ जैसी फिल्मों में काम करने का अवसर मिला।
रहमान ने कहा, ‘‘‘लगान’ मेरे लिए मील का पत्थर रही क्योंकि यह मेरी शुरुआती फिल्मों में से एक थी जिसे ऑस्कर नामांकन मिला। एक तरह से पूरी दुनिया ने इसे देखा।’’
साल 1893 की पृष्ठभूमि पर आधारित ‘लगान’ मध्य भारत के काल्पनिक गांव चंपानेर के किसानों की कहानी है, जिन्हें एक ब्रिटिश अधिकारी क्रिकेट मैच जीतने पर लगान से छूट देने की चुनौती देता है।
रहमान ने बताया कि जब गोवारीकर पहली बार उनके पास फिल्म लेकर आए थे, तब संगीत की कोई तय रूपरेखा नहीं थी और फिल्म का संगीत धीरे-धीरे विकसित हुआ। यह दोनों की पहली साझेदारी थी, जिसके बाद उन्होंने स्वदेस, जोधा अकबर और मोहनजोदड़ो जैसी फिल्मों में भी साथ काम किया।
उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पास कई तरह के संगीत विचार होते हैं और मैं निर्देशक की प्रतिक्रिया का इंतजार करता हूं, क्योंकि वही पूरी फिल्म की दृष्टि को समझता है। कभी वह नेतृत्व करता है, कभी हम करते हैं और कभी-कभी कुछ चीजें अपने आप सामने आ जाती हैं।’’
रहमान ने कहा कि फिल्म के ग्रामीण परिवेश को समझने के लिए टीम भुज गई थी और वहां लोक संगीतकारों से बातचीत की थी। उन्होंने बताया कि पारंपरिक ध्वनियों को आधार बनाकर संगीत तैयार किया गया, हालांकि उसमें आधुनिक वाद्ययंत्रों का भी इस्तेमाल किया गया।
उन्होंने खुलासा किया कि फिल्म के लोकप्रिय गीत ‘मितवा’ और ‘ओ रे छोरी’ मूल रूप से इस फिल्म के लिए तैयार नहीं किए गए थे, बल्कि उनकी पुरानी धुनों को फिल्म के अनुरूप ढाला गया था।
रहमान ने कहा, ‘‘जब मैंने ये दोनों धुनें आशुतोष को सुनाईं तो उन्हें पसंद आईं। इसके बाद हमने उन्हें फिल्म के माहौल के अनुरूप बदला। फिर ‘ओ पालनहारे’, ‘राधा कैसे न जले’ और अंत में ‘चले चलो’ की रचना की गई।’’
उन्होंने बताया कि एल्बम के आठ गीतों में से ‘घनन घनन’ सबसे चुनौतीपूर्ण था क्योंकि इसमें कई गायकों की आवाज और अलग-अलग पात्रों की भावनाओं को समाहित करना था।
रहमान ने कहा कि सुखविंदर सिंह, उदित नारायण, शंकर महादेवन और अलका याज्ञिक सहित सभी गायकों ने इस गीत को अलग पहचान दी। उन्होंने बताया कि प्रेरणादायक गीत ‘चले चलो’ को अपनी आवाज देने का निर्णय भी गोवारीकर के आग्रह पर लिया गया था।
रहमान ने गायिका आशा भोसले के साथ काम करने के अनुभव को भी याद किया। उन्होंने कहा कि गीत ‘राधा कैसे न जले’ को आशा भोसले की आवाज ने कालजयी बना दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘जब कोई महान गायक आपके साथ काम करता है तो आप रचना को और बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। उनकी प्रस्तुति से नए-नए भाव और बारीकियां स्वतः सामने आती हैं।’’
रहमान ने गीतकार जावेद अख्तर को भी एल्बम की सफलता का श्रेय देते हुए कहा कि गीतों की रिकॉर्डिंग के दौरान वह लगातार मौजूद रहते थे और शब्दों तथा धुनों को बेहतर बनाने में सक्रिय भूमिका निभाते थे।
उन्होंने कहा, ‘‘यह पूरी तरह सहयोगात्मक रचनात्मक प्रक्रिया थी। ‘चले चलो’ गीत भी जावेद साहब के योगदान से अपने शुरुआती रूप ‘नशा नशा’ से विकसित होकर अंतिम स्वरूप में आया।’’
भाषा मनीषा शोभना
शोभना