RSS 100 Years Journey Program || Image- Money Control File
मुंबई: आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी के “खिलाफ” नहीं है, न ही सत्ता चाहता है और न ही दबाव समूह बनने का लक्ष्य रखता है। (RSS 100 Years Journey Program) उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का एकमात्र उद्देश्य समाज को एकजुट करना है। यह कार्यक्रम वर्ली स्थित नेहरू सेंटर में आयोजित दो दिवसीय व्याख्यान शृंखला ‘संघ की 100 साल की यात्रा : नये क्षितिज’ के अंतर्गत हुआ।
भगवत ने कहा कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने समाज में एकता की कमी, अनुशासन और स्वच्छता के अभाव, बढ़ते स्वार्थ, अपर्याप्त ज्ञान और व्यापक गरीबी जैसी कमजोरियों की पहचान की थी। इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए उन्होंने 1925 में विजयदशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। संघ ने बहुत पहले यह तय कर लिया था कि समाज के एकीकरण के अलावा उसका कोई अन्य एजेंडा नहीं होगा।
राजनीति को लेकर संघ प्रमुख ने कहा कि कई लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस की वजह से हैं, लेकिन राजनीतिक दल एक अलग इकाई है और आरएसएस का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि भले ही संघ के स्वयंसेवक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हों, लेकिन आरएसएस स्वयं राजनीति में शामिल नहीं है और न ही किसी घटना की प्रतिक्रिया के रूप में कार्य करता है।
अपने संबोधन में भगवत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उभरी विभिन्न विचारधाराओं का उल्लेख किया और राजा राम मोहन रॉय, स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. बीआर आंबेडकर और भगत सिंह जैसे नेताओं के साथ हेडगेवार की चर्चाओं का जिक्र किया। (RSS 100 Years Journey Program) उन्होंने कहा कि हेडगेवार इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल जाएगी, लेकिन यदि समाज की आंतरिक कमजोरियां दूर नहीं हुईं तो गुलामी फिर लौट सकती है।
संघ की कार्यप्रणाली पर बोलते हुए भगवत ने कहा कि आरएसएस कोई अर्धसैनिक संगठन नहीं है और न ही कोई अखाड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ अपने स्वयंसेवकों की गतिविधियों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं रखता। संघ की मूल पहचान उसकी शाखा प्रणाली है, जिसमें प्रतिदिन एक घंटे के शारीरिक अभ्यास और मानसिक अनुशासन के माध्यम से सभी वर्गों के लोग साथ काम करते हैं।
हिंदू शब्द की व्याख्या करते हुए भगवत ने कहा कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है और यह कोई संज्ञा नहीं, बल्कि विशेषण है। उन्होंने कहा कि गुरु नानक ने भी बाबर के आक्रमण के समय इस शब्द का प्रयोग किया था। (RSS 100 Years Journey Program) भगवत ने कहा कि भारतीय मुसलमान और ईसाई इस भूमि में गहराई से जुड़े हैं, जो उनके व्यवहार को आकार देता है, और भारत का लक्ष्य बलपूर्वक प्रभुत्व नहीं, बल्कि उदाहरण के माध्यम से ‘विश्वगुरु’ बनना है।