मेरी बेटी मेघना अपनी कहानियों को मुझे सूंघने तक नहीं देती: गुलजार
मेरी बेटी मेघना अपनी कहानियों को मुझे सूंघने तक नहीं देती: गुलजार
मुंबई, 11 सितंबर (भाषा) मेघना जब भी किसी पटकथा को लिखती हैं तो सबसे पहले उनके पिता, जाने-माने कवि-गीतकार और फिल्मकार गुलजार उसे पढ़ते हैं।
वह उसमें बदलाव या सुधार नहीं करते, बल्कि सिर्फ अपनी प्रतिक्रिया देते हैं।
कई बार कोई पंक्ति या दृश्य उन्हें बहुत प्रभावित करता है तो वह केवल विस्मयादिबोधक चिह्न लगाते हैं।
यह एक छोटा-सा रिवाज है, जो पिता-पुत्री की रचनात्मक साझेदारी को दर्शाता है और बहुत लंबे अरसे से चला आ रहा है।
गुलजार ने मेघना की पहली फिल्म ‘फिलहाल’ से लेकर ‘तलवार’, ‘राजी’, ‘छपाक’ और ‘सैम बहादुर’ जैसी चर्चित फिल्मों व अब उनकी नई फिल्म ‘दायरा’ तक सभी निर्देशन वाली फिल्मों में गीतकार के रूप में काम किया है।
उन्होंने कहा कि मेघना जब तक पटकथा लिख रही होती हैं, तब तक उन्हें उसे देखने का मौका नहीं मिलता।
गुलजार ने ‘दायरा’ के प्रचार के लिए आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा, “जब मेघना पटकथा लिख रही होती है तो उसे देखना मुश्किल होता है। वह मुझे देखने नहीं देती, यहां तक कि उसके पास आने या उसे सूंघने तक नहीं देती। मैं इसे सही मानता हूं और यह उचित भी है क्योंकि हस्तक्षेप करना अलग बात है। साथ ही, मेरी राय की छाया उस पर क्यों पड़े। इसलिए मैं उसे अपना काम पूरा करने देता हूं।”
उन्होंने कहा, “अगर फिल्मों में गाने होते हैं तो उसे मुझे पटकथा दिखानी पड़ती है। यहां तक कि अगर सिर्फ एक गाना भी हो तो मुझे पटकथा देखनी ही पड़ती है।”
मेघना ने बताया कि उनके पिता को उनकी पटकथा का पहला ड्राफ्ट पूरा होने के बाद ही उसे देखने का मौका मिलता है।
इसके बाद उनका छोटा-सा रिवाज शुरू होता है। वह पटकथा को स्पाइरल बाइंड करवाकर गुलजार को पढ़ने के लिए देती हैं।
इसके बाद गुलजार अपनी टिप्पणियां साझा करते हैं।
मेघना ने कहा, “जब भी मैं किसी पटकथा का पहला ड्राफ्ट पूरा करती हूं तो उसकी पहली प्रति स्पाइरल बाइंड करवाकर उन्हें (पिता गुलजार को) पढ़ने के लिए देती हूं। इसके बाद वह उसमें अपने नोट्स लिखते हैं। अगर उन्हें कुछ पसंद आता है तो वह वहां विस्मयादिबोधक चिह्न लगा देते हैं।”
गुलजार के लिए विस्मयादिबोधक चिह्न किसी पंक्ति या शब्द की सराहना करने का उनका तरीका है।
करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमार अभिनीत फिल्म ‘दायरा’ के साथ मेघना गुलजार एक बार फिर अपराध पर आधारित कहानी दर्शकों के सामने लाई हैं।
उन्होंने एक दशक से भी पहले फिल्म ‘तलवार’ बनाई थी।
जहां वर्ष 2015 में आई फिल्म ‘तलवार’ में 2008 में नोएडा में हुए आरुषि तलवार और घरेलू सहायक हेमराज के दोहरे हत्याकांड को दिखाया गया था, वहीं ‘दायरा’ एक युवती के खिलाफ हुए जघन्य अपराध के बाद की स्थिति की पड़ताल करती है।
फिल्म में पुलिस के दो वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो न्याय को लेकर एक-दूसरे के विरोधी पक्ष में खड़े नजर आते हैं।
भाषा जितेंद्र नरेश
नरेश

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