NCP merger Maharashtra, image source: NCP parti 1
Mumbai News: दिवंगत अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और उनके चाचा एवं राजनीति के दिग्गज माने जाने वाले शरद पवार नीत राकांपा (शप) के प्रस्तावित विलय की प्रक्रिया ‘‘ पूरी तरह से आगे बढ़ रही है’’। (NCP merger Maharashtra) सूत्रों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अजित पवार और शरद पवार की बातचीत ‘अंतिम चरण’में पहुंच चुकी थी। (NCP merger Maharashtra) अजित पवार का बुधवार को बारामती में हुए विमान हादसे में निधन हो गया था।
सूत्रों ने बताया कि हालांकि, इस विलय से सत्ता समीकरणों में भी बदलाव आने की उम्मीद है क्योंकि राकांपा (शप) धड़े का मानना है कि अनुभवी नेता शरद पवार अब स्वाभाविक रूप से एकीकृत कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन में ‘केंद्रीय भूमिका’ निभाएंगे जबकि सत्तारूढ़ राकांपा के नेता अजित पवार की राजनीतिक विरासत को बनाए रखने के लिए उनकी पत्नी और राज्यसभा सदस्य सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री पद के लिए प्रस्तावित करने को इच्छुक हैं।
उन्होंने बताया कि अजित पवार के जीवित रहते ही दोनों दलों के विलय को लेकर बातचीत शुरू हो गई थी। (NCP merger Maharashtra) दरअसल, पुणे और पिंपरी चिंचवड में दोनों दलों ने महानगरपालिका चुनाव भी साथ मिलकर लड़ा था।
शरद पवार ने 1999 में राकांपा की स्थापना की थी जिसे जुलाई 2023 में अजित पवार ने विभाजित कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली ‘महायुति’ सरकार में शामिल हो गए थे। (NCP merger Maharashtra) उस समय उन्हें उपमुख्यमंत्री नियुक्त किया गया था। नवंबर 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री बनने पर भी अजित पवार इसी पद पर बने रहे। राकांपा के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों गुटों के बीच कड़ा संघर्ष हुआ था, जिसमें अजित पवार के खेमे को मूल ‘राकांपा’नाम और ‘अलार्म घड़ी’ का चुनाव चिह्न मिला था।
वर्तमान में राकांपा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत ‘महायुति’ सरकार का हिस्सा है, जबकि राकांपा(शप)विपक्षी महा विकास आघाडी (एमवीए) का एक घटक है। सूत्रों ने बताया कि हाल की महानगरपालिका चुनावों के बाद राकांपा के दोनों गुटों के बीच विलय की बातचीत ने गति पकड़ी है। राकांपा(शप)के सूत्रों ने बताया कि बुधवार को हुए विमान हादसे से पहले दोनों पक्ष बातचीत के ‘उन्नत चरण’ पर पहुंच चुके थे, और आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों के समापन के तुरंत बाद आठ फरवरी को विलय की घोषणा किये जाने की योजना थी।
सूत्रों ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘परिवार और पार्टी को फिर से एकजुट करने की प्रक्रिया पहले से ही चल रही थी। अजित दादा ने खुद वरिष्ठ नेताओं के साथ मतभेदों को दूर करने के लिए कई दौर की बातचीत की थी।’’ उन्होंने बताया कि दोनों धड़ों ने राकांपा के घड़ी चिह्न पर पुणे और पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका चुनाव साथ लड़कर संबंधों में ‘नरमी’ का संकेत पहले ही दे दिया था। सूत्रों के मुताबिक रणनीति यह थी कि स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान दोनों धड़े अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए ‘स्थिति का जायजा लें’ और फिर पूर्ण विलय की घोषणा करें।
अजित पवार के अचानक निधन के बाद राकांपा(शप)खेमे का मानना है कि अनुभवी नेता शरद पवार अब स्वाभाविक रूप से एकीकृत कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन में ‘केंद्रीय भूमिका’ निभाएंगे। हालांकि, तत्काल ध्यान शोक संतप्त परिवार को सांत्वना देने पर केंद्रित है। सूत्रों के मुताबिक जहां एक ओर सत्तारूढ़ राकांपा परिवार की राजनीतिक विरासत को बनाए रखने के लिए कथित तौर पर सुनेत्रा पवार का नाम उपमुख्यमंत्री पद के लिए प्रस्तावित करने पर विचार कर रही है, वहीं शरद पवार खेमे के सूत्रों का कहना है कि विलय से मंत्रिमंडल का समीकरण मौलिक रूप से बदल जाएगा।
एक सूत्र ने बताया, ‘‘यदि विलय होता है, तो राकांप(शप)के नेता राज्य के शासन और पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।’’ इस विलय को पश्चिमी महाराष्ट्र के ‘चीनी उत्पादक क्षेत्र’ पर फिर से पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है जहां पर भाजपा हाल ही में हुए महानगरपालिका चुनावों में सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एकीकृत राकांपा के पास नौ लोकसभा सदस्य और 51 विधायकों का एक मजबूत आधार होगा, जो संभावित रूप से सत्तारूढ़ ‘महायुति’ गठबंधन या एमवीए के भीतर के राजनीतिक समीकरण को बदल सकता है। राकांपा(शप)के नेताओं का फिलहाल कहना है कि उनकी प्राथमिकता सात फरवरी को होने वाले आगामी स्थानीय चुनाव हैं, जिनमें वे दिवंगत नेता के अंतिम राजनीतिक प्रयासों को श्रद्धांजलि के रूप में अजित पवार के नेतृत्व वाले धड़े के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।
सूत्रों ने बताया कि अजित पवार राकांपा के दोनों धड़ों के संभावित विलय को दीर्घकालिक रणनीति के हिस्से के तौर पर देख रहे थे, खासकर 2029 के चुनावों और पार्टी की भविष्य की प्रासंगिकता के मद्देनजर। उनके मुताबिक अजित पवार को विश्वास था कि विलय अंततः होगा, और महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके चाचा शरद पवार की सहमति से ही यह संभव होगा।
अजित पवार भाजपा और शिवसेना के साथ सत्ता में भागीदारी के बावजूद कहते रहे थे कि वह एक धर्मनिरपेक्ष नेता हैं जो ‘शाहू, फुले और आंबेडकर’ (छत्रपति शाहू महाराज, महात्मा फुले और डॉ. बी.आर. आंबेडकर) की प्रगतिशील वैचारिक विरासत के प्रति प्रतिबद्ध हैं। सूत्रों के मुताबिक भाजपा-शिवसेना से गठबंधन की मजबूरी के बावजूद अजित पवार के ये विचार उनकी राजनीतिक सोच के केंद्र में रहे।
सूत्रों के मुताबिक दोनों धड़ों के विलय और भविष्य की रणनीति को लेकर उच्च स्तरीय चर्चाओं में शरद पवार, सुप्रिया सुले, अजित पवार और जयंत पाटिल शामिल थे। उन्होंने बताया कि इन वार्ताओं का मुख्य केंद्र व्यापक राजनीतिक दिशा, नेतृत्व सामंजस्य और दीर्घकालिक चुनावी रणनीति था। द्वितीयक स्तर की चर्चाएं शशिकांत शिंदे, राजेश टोपे और अमोल कोल्हे जैसे नेताओं ने कीं, जिन्होंने संगठनात्मक और रणनीतिक मुद्दों पर बात की।