मुंबई, 13 अप्रैल (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने मकोका और पॉक्सो जैसे विशेष कानूनों के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को फर्लो न दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस तरह का इनकार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
इसी के साथ उच्च न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिए इस कानूनी प्रश्न को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया कि क्या राज्य सरकार महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम जैसे विशेष कानूनों के तहत दोषी करार दिए गए व्यक्तियों को फर्लो देने से इनकार कर सकती है।
न्यायमूर्ति अनिल पनसारे और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की नागपुर पीठ ने 10 अप्रैल को पत्रकार जे डे की हत्या से जुड़े मामले में दोषी ठहराए गए गैंगस्टर छोटा राजन के सहयोगी रोहित तंगप्पा जोसेफ की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया।
पीठ ने मामले को अंतिम निर्णय के लिए बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के लिए पूर्व के परस्पर विरोधी फैसलों का हवाला दिया। उसने याचिका को उचित आदेशों के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया।
अमरावती के जेल अधिकारियों ने पैरोल और फर्लो नियमों में दिसंबर 2024 में किए गए संशोधन का हवाला देते हुए जोसेफ की फर्लो अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके उन्होंने फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख किया था।
इस संशोधन में विशिष्ट कानूनों और गंभीर अपराधों के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्तियों के लिए फर्लो पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस नीत सरकार ने महाराष्ट्र कारागार (फर्लो और पैरोल) नियमों में संशोधन किया था, जिसके तहत गंभीर अपराधों या मकोका, पॉक्सो और अन्य विशेष कानूनों के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को फर्लो देने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में सवाल उठाया कि यह कैसे माना जा सकता है कि गंभीर अपराधों के लिए विशेष अधिनियमों के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति जेल में लगातार कैद रहने से होने वाले हानिकारक प्रभावों के शिकार नहीं होंगे।
अदालत ने कहा कि किसी सजायाफ्ता कैदी को जेल में उसके आचरण या व्यवहार के आधार पर या सामाजिक हित की रक्षा के लिए फर्लो देने से इनकार करना उचित हो सकता है, लेकिन किसी विशिष्ट अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाना फर्लो देने के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।
उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट अधिनियम के तहत दोषी ठहराए जाने के आधार पर ही फर्लो देने से इनकार करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और ऐसा रुख सुधारात्मक दृष्टिकोण के विपरीत होगा।
अदालत ने कहा, “फर्लो का मकसद कैदियों को अपने परिजनों के संपर्क में रहने और पारिवारिक मामलों से निपटने में सक्षम बनाना, जेल में लगातार कैद के हानिकारक प्रभाव से राहत प्रदान करना और भविष्य के बारे में आशावान रहने तथा जीवन में सक्रिय रुचि रखने के लिए प्रेरित करना है।”
उसने कहा कि अगर विशेष कानूनों के तहत दोषसिद्धि के आधार पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो यह मान लेना होगा कि इन कैदियों को अपने परिजनों के साथ संपर्क में रहने का अधिकार नहीं है।
उच्च न्यायालय ने कहा, “हमें इस बात का कोई तर्कसंगत कारण नहीं दिखता कि कैदियों को, चाहे उन्हें किसी विशेष अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया हो, अपने परिजनों के साथ संपर्क में रहने और/या अपने जीवन एवं भविष्य के बारे में आशावान रहने की अनुमति क्यों नहीं दी जानी चाहिए।”
जोसेफ को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत हत्या और आपराधिक साजिश तथा मकोका की प्रासंगिक धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। उसने किसी आपात स्थिति के कारण अपने परिवार से मिलने के लिए 28 दिनों की पैरोल मांगी थी।
जोसेफ के अलावा, गैंगस्टर छोटा राजन और सात अन्य लोगों को भी इस मामले में दोषी ठहराया गया था।
डे को 11 जून 2011 को मुंबई के पवई इलाके में उनके आवास के पास दो मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने गोली मार दी थी, जिससे उनकी मौत हो गई थी।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, छोटा राजन ने डे की हत्या की सुपारी दी थी, क्योंकि वह अपने खिलाफ लिखे गए उनके लेखों से नाराज था।
भाषा पारुल माधव
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