रायपुर, 26 मार्च (भाषा) तोक्यो ओलंपिक की रजत पदक विजेता भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने कहा कि एशियाई खेलों में पदक जीतना इस साल उनका सबसे बड़ा लक्ष्य है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से मीराबाई चानू भारतीय भारोत्तोलन का चेहरा रही हैं। उनके शानदार करियर में एशियाई खेलों का पदक ही एकमात्र ऐसी उपलब्धि है, जो अभी तक उनके खाते में नहीं जुड़ पाई है। उनके पास तोक्यो ओलंपिक का रजत, विश्व चैंपियनशिप के तीन पदक और राष्ट्रमंडल खेलों में भी तीन पदक हैं।
चानू ने यहां खेलो इंडिया जनजातीय खेलों (केआईटीजी) के उद्घाटन समारोह के बाद संवाददाता सम्मेलन में कहा, “एशियाई खेल मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वहां मेरा काम पूरा नहीं हुआ है। एशियाई खेलों में प्रतिस्पर्धा का स्तर बहुत ऊंचा होता है, जिससे यह और चुनौतीपूर्ण और रोमांचक बन जाता है।”
एशियाई खेलों में चानू का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। उन्होंने 2014 एशियाई खेलों में पदार्पण करते हुए नौवां स्थान हासिल किया था, जबकि पीठ की चोट के कारण उन्हें 2018 संस्करण से बाहर रहना पड़ा।
वह 2022 एशियाई खेलों में पदक के सबसे करीब पहुंची थीं, लेकिन कूल्हे की चोट के कारण अहम समय पर उनका अभियान प्रभावित हुआ और वह पदक से मामूली अंतर से चूक गईं।
अब 31 वर्षीय चानू महाद्वीपीय प्रतियोगिता में संभवतः अपने अंतिम प्रयास की तैयारी कर रही हैं और उनका लक्ष्य अपने शानदार करियर में इस एकमात्र कमी को पूरा करना है।
इस साल जुलाई-अगस्त में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों और 19 सितंबर से शुरू होने वाले एशियाई खेलों के बीच वजन संतुलन बनाना उनके लिए बड़ी चुनौती होगा।
वह राष्ट्रमंडल खेलों में 48 किग्रा वर्ग में हिस्सा लेंगी, जबकि एशियाई खेलों के लिए फिर से 49 किग्रा वर्ग में वापसी करेंगी।
उन्होंने कहा, “मैं राष्ट्रमंडल खेलों तक अपना वजन 48 किग्रा के भीतर रखूंगी, लेकिन इसके दो महीने बाद ही एशियाई खेल हैं जो 49 किग्रा वर्ग में हैं, इसलिए मुझे फिर से बदलाव करना होगा।”
चानू ने खेलो इंडिया जनजातीय खेलों की शुरुआत की सराहना करते हुए इसे दूरदराज के इलाकों के खिलाड़ियों के लिए महत्वपूर्ण मंच बताया।
उन्होंने कहा, “एक खिलाड़ी के तौर पर मेरे लिए यह गर्व का क्षण है कि सरकार केआईटीजी जैसी पहल को प्राथमिकता दे रही है। यह प्रतियोगिता दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच देगी।”
उन्होंने कहा, “मैंने देशभर में, खासकर पूर्वोत्तर और अन्य जनजातीय क्षेत्रों में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं, जहां प्रतिभा तो है लेकिन ऐसे मंचों की कमी के कारण वह निखर नहीं पाती।”
भाषा आनन्द पंत
पंत