इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गन्ना भुगतान में विलंब के मामले में आयुक्त को तलब किया

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गन्ना भुगतान में विलंब के मामले में आयुक्त को तलब किया

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गन्ना भुगतान में विलंब के मामले में आयुक्त को तलब किया
Modified Date: July 23, 2026 / 10:30 pm IST
Published Date: July 23, 2026 10:30 pm IST

लखनऊ, 23 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों के बकाये के भुगतान में देरी और कानूनी रूप से जरूरी ब्याज का भुगतान न करने के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिये प्रदेश के गन्ना आयुक्त को आगामी तीन अगस्त को पेश होने का निर्देश दिया है। अदालत ने पहले कहा था कि विशिष्ट निर्देश देने के बावजूद राज्य सरकार पूर्ण और सटीक आंकड़े पेश करने में नाकाम रही है।

अदालत ने कहा कि कानून की व्याख्या और उसे लागू करने का तरीका केवल चीनी मिलों के पक्ष में नहीं होना चाहिए बल्कि गन्ना किसानों के अधिकारों की भी बराबर सुरक्षा होनी चाहिए।

यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने ‘किसान मजदूर संगठन’ के संयोजक वी.एम. सिंह द्वारा वर्ष 2006 में दायर जनहित याचिका पर 16 जुलाई को सुनवाई के दौरान दिया गया। आदेश की प्रति बृहस्पतिवार को अदालत की वेबसाइट पर अपलोड की गई।

इस जनहित याचिका में वर्ष 1996-97 के पेराई सत्र से गन्ना किसानों के बकाये पर कानूनी रूप से अनिवार्य ब्याज के भुगतान का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

पीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि गन्ना आयुक्त की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करें कि गन्ना किसानों को तय समय के भीतर भुगतान किया जाए।

पीठ ने कहा कि उसकी मुख्य चिंता यह पता लगाना है कि क्या गन्ना आयुक्त ने कानून के तहत अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभाई है।

अदालत ने यह भी कहा कि अगर 1996 से गन्ना किसानों को देर से हुए भुगतान पर ब्याज नहीं दिया गया है, तो यह रकम सैकड़ों या हज़ारों करोड़ रुपये हो सकती है। ऐसी स्थिति में इस पहलू की भी जांच करनी होगी कि कानूनी प्रावधानों को लागू न कर पाने के लिए कौन जिम्मेदार था।

पीठ ने कहा कि एक मई 2024 के अपने आदेश में उसने राज्य को 1996-97 से साल-दर-साल के आंकड़े देने का निर्देश दिया था, जिसमें समय पर किया गया भुगतान, देर से किया गया भुगतान और ऐसे विलंब से हुए भुगतान पर लगाए गए और वास्तव में दिए गए ब्याज का विवरण शामिल हो।

हालांकि, राज्य द्वारा दाखिल हलफनामे में अदालत द्वारा उठाए गए सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया गया और प्रथम दृष्ट्या ऐसा लगा कि विशिष्ट जानकारी देने से बचने की कोशिश की गई है।

पीठ ने 23 दिसंबर 2021 के अपने फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि चीनी मिलें 14 दिनों के भीतर गन्ने का भुगतान करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं और उस समय-सीमा के बाद किए गए किसी भी भुगतान पर 15 फीसद सालाना की दर से ब्याज देय होगा।

अदालत ने कहा कि फैसले के खिलाफ विशेष पुनरीक्षण याचिका को उच्चतम न्यायालय पहले ही खारिज कर चुका है, इसलिए राज्य सरकार के मामले में यह फैसला अंतिम हो चुका है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अगर 1996 से गन्ना किसानों को देर से भुगतान पर कानूनी ब्याज नहीं दिया गया है, तो यह देनदारी सैकड़ों या हजारों करोड़ रुपये तक हो सकती है।

अदालत ने कहा कि केवल इस दलील को स्वीकार नहीं किया जाएगा कि ऐसे ब्याज के भुगतान से चीनी मिलें बंद हो जाएंगी, क्योंकि कानून के तहत गरीब गन्ना किसानों के हितों को भी समान सुरक्षा मिलनी चाहिए।

पीठ ने निर्देश दिया कि इस मामले की जांच तीन चरणों यानी 1996 से 2006 तक, 2007 से 2013, और 2014 से 2025-26 तक में की जाएगी।

अदालत ने गन्ना आयुक्त को यह भी निर्देश दिया कि वह अगली सुनवाई में बताएं कि क्या अदालत के 2021 के फैसले के बाद कानून के तहत जारी वसूली प्रमाणपत्र में देर से भुगतान पर 15 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज लगाया गया था।

‘यूपी शुगर मिल्स एसोसिएशन’ ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि अगर मिलों को गन्ने के बकाया भुगतान में देरी पर पूरा ब्याज देने का निर्देश दिया जाता है तो उन पर हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा और कई चीनी मिलें बंद हो सकती हैं।

पीठ ने इस दलील पर कहा, ‘‘तो उन गरीब गन्ना किसानों के हितों का क्या जो देश की अर्थव्यवस्था में भी योगदान देते हैं? कानून की व्याख्या और उसे लागू करने का तरीका ऐसा क्यों होना चाहिए जिससे गन्ना किसानों के बजाय सिर्फ चीनी मिलों को फायदा हो?’’

भाषा सं. सलीम धीरज

धीरज


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