लखनऊ में बढ़ रहे उमस भरी गर्मी के दिन, गर्मी से होने वाले जोखिमों में भी इजाफा

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लखनऊ में बढ़ रहे उमस भरी गर्मी के दिन, गर्मी से होने वाले जोखिमों में भी इजाफा

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  • Publish Date - August 26, 2026 / 09:51 PM IST,
    Updated On - August 26, 2026 / 09:51 PM IST

लखनऊ, 26 अगस्त (भाषा) उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ दिन-ब-दिन एक नए तरीके के ‘हीट स्ट्रेस’ से जूझ रही है। एक ऐसी मुश्किल स्थिति, जिसमें चढ़ता तापमान बढ़ती उमस के साथ जुड़कर शहर के लोगों को ऐसी गर्मी का एहसास करा रहा है, जिसे किसी थर्मोमीटर से नहीं नापा जा सकता।

प्रतिष्ठित ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि अगर उमस भरी गर्मी के हालात इसी तरह विकट होते रहे तो वर्ष 2050 तक लखनऊ में हर साल ऐसी गर्मी से 4000 लोगों की मौत होगी।

भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉक्टर के. जे. रमेश ने बताया कि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की वजह से तापमान में बढ़ोत्‍तरी के साथ-साथ खासकर सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में नमी के स्तर में भी अपेक्षाकृत काफी इजाफा हुआ है।

उन्होंने कहा, ‘लखनऊ सिंधु-गंगा के मैदानों के बीचो-बीच बसा है। इस इलाके की कम ऊंचाई और बेसिन जैसी भौगोलिक बनावट के चलते हवा ठहरी रहने की वजह से नमी बरकरार रहती है। नमी का ऊंचा स्तर उमस भरी गर्मी के असर को और बढ़ा देता है जिससे सेहत से संबंधित जोखिम खासकर सांस और गर्मी से जुड़ी बीमारियां बढ़ जाती हैं।’

जलवायु थिंक टैंक ‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ द्वारा किये गये विश्लेषण की रिपोर्ट से पता लगता है कि वर्ष 2015 से 2024 के बीच लखनऊ के लोगों ने गर्मी और भीषण उमस भरे 289 दिन काटे हैं और इन दिनों में अधिकतम तापमान कम से कम 35 डिग्री सेल्सियस और उमस का स्तर 60 फीसद या उससे ज्यादा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक जहां स्थानीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन सिंधु गंगा के मैदानों में नमी की मात्रा को बढ़ा रहा है, वहीं लखनऊ का तेजी से और अधिकतर अनियोजित तरीके से हो रहा फैलाव अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट (यूएचआई) के जरिये स्थानीय स्तर पर गर्मी को कई गुना बढ़ा रहा है।

विश्लेषण के मुताबिक, यह रुख लगातार एक हकीकत बनता जा रहा है क्योंकि वर्ष 2015 से 2019 के बीच लखनऊ में उमस भरी गर्मी वाले 123 दिन रिकॉर्ड किए गए और इस तरह से इन पांच वर्षों के दौरान इनका सालाना औसत 24.6 दिन रहा। वहीं, वर्ष 2020 से 2024 के दौरान यह संख्या 123 से बढ़कर 166 हो गई जिनमें से 2020 में सबसे ज्यादा 45 दिन भीषण गर्मी और उमस भरे रहे। इससे यह जाहिर होता है कि उमस भरी गर्मी वाले दिन लगातार बढ़ रहे हैं।

‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2050 तक ज्यादा उत्सर्जन वाले हालात में लखनऊ में सभी आयु वर्गों के लोगों में गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों की संख्या में लगभग 50% की बढ़ोत्‍तरी हो सकती है। इसके अनुसार नतीजतन प्रति हजार लोगों पर गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों का प्रतिशत 0.6 तक पहुंच जाएगा और नगरीय विस्तार को ध्यान में रखते हुए इसका मतलब है कि लखनऊ में हर साल गर्मी से लगभग 4000 लोगों की मौत हो सकती है।

वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक सीमा जावेद ने बताया कि ज्यादा उमस की वजह से पसीने के जरिए शरीर को खुद को ठंडा रखने की क्षमता कम हो जाती है जिससे ज्यादा तापमान वाले गर्मी के दिनों के मुकाबले कम तापमान होने पर भी ‘हीट स्ट्रोक’ का खतरा बढ़ जाता है।

जावेद ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दुष्प्रभावों के बीच अब लोगों को यह बात समझनी चाहिए कि गर्मियां अब पहले जैसी नहीं रहीं। उन्होंने कहा कि उमस भरी गर्मी के दुष्प्रभावों से बचाव के लिए श्रमिकों और कामगारों की सेवा शर्तों से जुड़ी सरकारी नीतियों में व्यापक बदलाव के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर भी कार्य करने की जरूरत है।

रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ की रातें औसतन ज्यादा गर्म हो रही हैं और वर्ष 2024 में जहां ऐसी रातों की संख्या 126 रिकॉर्ड की गई थी, वहीं 2015 में यह 124 और 2016 में 128 रही। रिपोर्ट के मुताबिक यहां तक कि वर्ष 2018 में न्यूनतम होने के बावजूद ऐसी रातों की संख्या 93 थी, जिससे यह जाहिर होता है कि रात के वक्त का बढ़ता तापमान अब कोई कभी-कभार होने वाली घटना नहीं बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया बन गई है।

नेचुरल रिसोर्सेस डिफेंस काउंसिल (एनआरडीसी) इंडिया में जलवायु अनुकूलनशीलता एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख अभियंत तिवारी ने कहा कि वर्ष 2015 से 2019 और 2020 से 2024 के बीच गर्मी तथा उमस वाले दिनों में हुई 35 फीसद की वृद्धि खासतौर पर फिक्र पैदा करती है, क्योंकि ज्यादा नमी के कारण पसीना नहीं सूखता है और पसीना सूखने से मिलने वाली ठंडक कम हो जाती है, वहीं गर्म रातों की वजह से दिन की गर्मी से शरीर को उबरने में परेशानी होती है।

रिपोर्ट के अनुसार उमस भरी गर्मी से श्रमिकों की उत्पादकता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है और काम के सालाना घंटों का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा ‘हीट स्ट्रेस’ (गर्मी के कारण उत्पन्न तनाव) के उन असुरक्षित स्तरों से प्रभावित होता है जब वेट बल्ब ग्लोब टेंपरेचर (डब्ल्यूबीजीटी) 30 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदूषणकारी तत्वों के अधिक उत्सर्जन की स्थिति में यह हिस्सेदारी 30 से 40 फीसद तक बढ़ सकती है, नतीजतन उत्पादकता में उल्लेखनीय गिरावट होती है और प्रतिवर्ष अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान भी होता है।

भाषा सलीम मनीषा अमित

अमित