इंडोर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स परमवीर चक्र विजेता धन सिंह थापा को समर्पित

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इंडोर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स परमवीर चक्र विजेता धन सिंह थापा को समर्पित

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  • Publish Date - August 12, 2026 / 09:19 PM IST,
    Updated On - August 12, 2026 / 09:19 PM IST

लखनऊ, 12 अगस्त (भाषा) भारतीय सेना ने अपने महान युद्ध नायक परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा की वीरता और राष्ट्रसेवा को सम्मान देते हुए लखनऊ छावनी स्थित सूर्य खेल परिसर के अत्याधुनिक इंडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को उनके नाम समर्पित किया है।

यहां जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, यह पहल लेफ्टिनेंट कर्नल थापा के अदम्य साहस, असाधारण नेतृत्व और राष्ट्रसेवा की गौरवशाली विरासत को चिरस्थायी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

इस अवसर पर आयोजित समारोह में लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा की पुत्रियां मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता, जीओसी-इन-सी, सूर्य कमान, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा के परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में समर्पण पट्टिका का अनावरण किया गया।

यह अवसर भारतीय सेना की अपने युद्ध नायकों को सदैव स्मरण करने और उनकी विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक बना।

वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन मेजर धन सिंह थापा 1/8 गोरखा राइफल्स के महज 28 सैनिकों के साथ पैंगोंग झील के उत्तर में स्थित सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सिरिजाप-1 चौकी की रक्षा कर रहे थे।

बीस अक्टूबर 1962 को संख्या और संसाधनों में भारी असमानता तथा भीषण तोपखाने और मोर्टार हमलों के बावजूद उन्होंने अपने सैनिकों के साथ दुश्मन के कई हमलों को विफल किया।

अंततः चौकी पर दुश्मन का कब्जा होने के बाद उन्हें युद्धबंदी बना लिया गया। शुरू में उन्हें वीरगति प्राप्त मानते हुए उनके असाधारण शौर्य और नेतृत्व के लिए देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

मई 1963 में स्वदेश लौटने के बाद उन्होंने सेना में अपनी विशिष्ट सेवा जारी रखी और लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंचे। वर्ष 1980 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने लखनऊ को अपना निवास बनाया और वर्ष 2005 में निधन होने तक सेना तथा उसकी गौरवशाली परंपराओं से जुड़े रहे।

बयान के अनुसार, धन सिंह थापा इंडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स अब खेल, फिटनेस और वेलनेस के आधुनिक केंद्र के साथ-साथ उनके शौर्य की जीवंत स्मृति के रूप में भी स्थापित रहेगा।

भाषा

राजेंद्र रवि कांत