लखनऊ, नौ अगस्त (भाषा) बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा का विरोध करते हुए रविवार को कहा कि सकारात्मक कार्रवाई इनके सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक मुक्ति और आत्मसम्मान से जुड़ा है।
मायावती ने इस मुद्दे का ‘‘राजनीतिकरण’’ करने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की आलोचना की।
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कहा, “देश में ‘बहुजन समाज’ में से ख़ासकर एससी, एसटी व ओबीसी वर्गों के लिये आरक्षण ‘सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति’ अर्थात् हमेशा से इनके आत्म-सम्मान की जिन्दगी से जुड़ा अति-महत्वपूर्ण व अत्यन्त संवेदनशील मामला है।”
उन्होंने कहा, “जाति के आधार पर सदियों से यहां तोड़े, सताये व पछाड़े गये एससी व एसटी समाज के लिये तो यह अत्यन्त जरूरी मामला भी विशेषकर तब बन जाता है जब जातिवादी द्वेष, शोषण, प्रताड़ना, अन्याय-अत्याचार कम होने का नाम ना ले और इसीलिये इसमें ‘क्रीमी लेयर’ की बात करना अनुचित ही नहीं बल्कि परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर के मानवतावादी संविधान के पवित्र उद्देश्यों के भी विरुद्ध है।”
मायावती ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हाल के उन बयानों की भी आलोचना की जिसमें उन्होंने कहा था कि आरक्षण का जानबूझकर राजनीतिकरण किया गया और इससे समाज में कड़वाहट पैदा हुई।
भागवत ने कहा था कि इसके लाभार्थियों को स्वेच्छा से इसके लाभ छोड़ देने चाहिए।
बसपा प्रमुख ने कहा, “वास्तव में यह इनकी (आरएसएस) ऐसी जातिवादी सोच है जिससे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति तो हो सकती है, किन्तु इससे संवैधानिक उद्देश्यों की अवहेलना होती है।”
उन्होंने कहा, “जातिगत भेदभाव को केवल आर्थिक उन्नति से कतई भी नहीं आंका जा सकता है, क्योंकि जातिवाद का दंश जीवन के हर पहलू में उन्हें डसता ही रहता है और जो क्रम अभी भी हर स्तर पर लगातार जारी है, यह आरएसएस से ज्यादा भला कौन जानता है?’’
मायावती ने कहा, “इतना ही नहीं बल्कि केन्द्र में अभी तक रही सभी सरकारें भी इस कड़वी जमीनी वास्तविकता को भलीभांति जानती और समझती हैं और इसीलिये अगर वर्तमान सरकार अपने वाजिब तर्कों के आधार पर इसकी प्रभावी व समुचित पैरवी करके एससी व एसटी समाज को ‘क्रीमी लेयर’ से दूर रखने हेतु अपना पक्ष अदालत से मनवा लेती है तो यह पूर्णतः उचित व संवैधानिक होगा।”
उन्होंने कहा, “अक्सर यही देखा गया है कि सरकारों के लचर रवैये व अच्छी कानूनी पैरवी के अभाव में ही अदालतें ‘सामाजिक परिवर्तन’ आदि के मामलों में सही से न्याय नहीं कर पाती हैं।”
उन्होंने कहा, “इस बारे में आरएसएस से भी यही कहना है कि वह परमपूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के मानवतावादी एवं कल्याणकारी संविधान को पूरा-पूरा आदर-सम्मान देते हुये आरक्षण को लेकर राजनीति करना छोड़ दे।”
भाषा राजेंद्र रंजन खारी
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