अल्पमत की आवाज को सम्मान देने से सदन की सर्वश्रेष्ठता तय होती : वासुदेव देवनानी

अल्पमत की आवाज को सम्मान देने से सदन की सर्वश्रेष्ठता तय होती : वासुदेव देवनानी

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  • Publish Date - January 20, 2026 / 09:20 PM IST,
    Updated On - January 20, 2026 / 09:20 PM IST

लखनऊ, 20 जनवरी (भाषा) राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने मंगलवार को कहा कि सदन की सर्वश्रेष्ठता इस बात से तय होती है कि वहां अल्पमत की आवाज को कितना सम्मान और महत्व दिया जाता है।

उप्र विधानभवन में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन के दूसरे दिन अपने संबोधन में राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष देवनानी ने कहा कि ”सदन की सर्वश्रेष्ठता इस बात से तय नहीं होती कि वहां बहुमत कितना प्रभावी है, बल्कि वह इस बात से तय होती है कि वहां अल्पमत की आवाज को कितना सम्मान और महत्व दिया जाता है।”

असहमति के स्वर को महत्व देने की वकालत करते हुए उन्‍होंने कहा कि “जनता हमसे अपेक्षा करती है कि हम शासन के हर निर्णय की समीक्षा करें और एक एक पैसा जनकल्‍याण में खर्च हो, यह विधायिका की जिम्मेदारी है।”

वासुदेव देवनानी ने कहा, ”लोकतंत्र का सबसे सशक्त आधार जनता का अटूट विश्वास होता है। यह विश्वास रातों रात निर्मित नहीं होता और न ही वह किसी एक चुनावी सफलता के परिणाम से परिलक्षित होता है। यह निरंतर व्यवहार, सतत संवाद और अटूट उत्तरदायित्व की परिणति है।”

देवनानी ने कहा कि ”हम सदन में बैठते हैं तो हमें संविधान के ट्रस्टी के रूप में व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि हमारे हाथ में जो शक्ति है वह जनता द्वारा दी गई पवित्र धरोहर है।”

उन्होंने कहा कि “जब हम जनता के प्रति विधायिका की जवाबदेही की बात करते हैं तो हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि विधायिका कोई स्वायत्त सत्ता केंद्र नहीं है बल्कि जनता की आकांक्षाओं और अभिलाषाओं का एक दर्पण है।”

उन्‍होंने कहा कि एक जीवंत लोकतंत्र वह है, जहां विधायिका जनता की समस्याओं को केवल सुनती नहीं, बल्कि उसे महसूस करती है। यदि सदन के बीच उठने वाली आवाजें जनता के दर्द और उसकी जरूरतों में सहायक नहीं है तो मुझे कहना पड़ेगा कि सदन केवल औपचारिक संस्था बनकर रह जाता है।

देवनानी ने कहा कि जब एक विधायक सदन में किसी योजना की खामी को उजागर करता है तो वास्तव में वह अपने दायित्व को पूर्ति करते हुए शासन को अधिक पारदर्शी बनाने का कार्य कर रहा होता है।

उन्‍होंने कहा कि सदन केवल संख्या बल के आधार पर न चले बल्कि जनता के हितों को महत्व दिया जाए और पीठासीन अधिकारियों की भूमिका रेफरी या अंपायर से ज्यादा संरक्षक के रूप में होती है।

भाषा

आनन्द रवि कांत