लखनऊः Vande Bharat: इस वक्त पूरे देश में धर्मों से जुड़े पुराने संस्थागत सिस्टम को बदलने पर बहस जारी है। मध्यप्रदेश मॉडल की तर्ज पर यूपी वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने की तैयारी की चर्चा है। सरकार इसे पारदर्शिता और बेहतर प्रबंधन की दिशा में कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और कई मुस्लिम संगठन इसे धार्मिक मामलों में दखल और राजनीतिक एजेंडा करार दे रहे हैं।
Vande Bharat: उत्तरप्रदेश वक्फ बोर्ड के पुनर्गठन की चर्चा के साथ ही राजनीतिक और धार्मिक बहस तेज हो गई है। इसकी शुरुआत बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष और यूपी सरकार में मंत्री दानिश आजाद अंसारी के बयान के बाद शुरू हुई। यूपी सरकार के मुताबिक वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 का मकसद सिर्फ बोर्ड की संरचना बदलना नहीं, बल्कि वक्फ संपत्तियों का बेहतर प्रबंधन, डिजिटलीकरण, पारदर्शिता और नियमित ऑडिट सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि नए बोर्ड में पसमांदा समाज, पिछड़े वर्ग, महिलाओं और कानून के मुताबिक दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को भी प्रतिनिधित्व मिलेगा। दानिश आजाद अंसारी के बयान के बाद हज कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मोहसिन रजा ने भी नए बोर्ड में दो हिंदू सदस्यों की नियुक्ति की मांग का समर्थन किया है और उसकी वजह भी बताई।
यूपी में इस प्रस्ताव का राजनीतिक और धार्मिक विरोध भी शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी और ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन ने पलटवार किया कि जब किसी हिंदू कमेटी या मंदिर कमेटी में मुसलमान नहीं हो सकता तो वक्फ बोर्ड में हिंदू क्यों? कुल मिलाकर मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किए जाने के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी उसी मॉडल पर चर्चा तेज है। हालांकि अंतिम फैसला राज्य सरकार को लेना है और वक्फ संशोधन कानून से जुड़े कई पहलुओं पर न्यायिक प्रक्रिया भी जारी है। लेकिन सवाल सिर्फ वक्फ बोर्ड के पुनर्गठन का नहीं है, बल्कि ये भी है कि क्या ये कदम पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाएगा या फिर आने वाले चुनावों से पहले सियासी बहस का नया मुद्दा बनेगा।