लखनऊ, 22 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में काम करने वाले सहायक अध्यापक उस तारीख से प्रधानाध्यापक के वेतन के हकदार हैं, जिस दिन से उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली थी।
न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बकाया वेतन के भुगतान को रिट याचिका दायर करने से पहले की तीन साल की अवधि तक सीमित करने वाली पहले की रोक को भी हटा दिया।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ ने पूनम रानी वर्षणी समेत 1,030 याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर याचिकाओं के समूह का निस्तारण करते हुए यह आदेश दिया।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि उनके संबंधित विद्यालयों में नियमित प्रधानाध्यापकों की नियुक्ति नहीं की गई थी और वे अलग-अलग तारीखों से प्रधानाध्यापक के दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे, लेकिन उन्हें प्रधानाध्यापक का वेतन नहीं दिया जा रहा था।
उच्च न्यायालय ने अपने एक पुराने फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कार्यवाहक प्रधानाध्यापकों को प्रधानाध्यापक के समान वेतन पाने के अधिकार को मान्यता दी गई थी।
हालांकि, उच्चतम न्यायालय के ‘भारत संघ बनाम तरसेम सिंह’ मामले के फैसले के आधार पर उस मामले में बकाया भुगतान को रिट याचिका दायर करने से पहले के तीन वर्षों तक सीमित कर दिया गया था।
पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने बाद में ‘माया बनर्जी बनाम भारत संघ’ मामले में इस मुद्दे पर विचार किया और कहा कि ‘एसके मस्तान बी’ मामले में दिए गए पहले के फैसले को देखते हुए ‘तरसेम सिंह’ मामले पर आधारित दृष्टिकोण कायम नहीं रखा जा सकता।
उच्च न्यायालय ने कहा कि कार्यवाहक प्रधानाध्यापक के रूप में दी गई सेवाओं के लिए मिलने वाला वेतन एक मूल्यवान अधिकार है, जो संपत्ति के अधिकार के समान है। इसलिए याचिकाकर्ताओं के बकाया वेतन को तीन वर्षों तक सीमित करने का कोई आधार नहीं है।
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सं, राजेंद्र रवि कांत